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Ratha Saptami Rituals: आरोग्य का वरदान पाने के लिए इस दिन जरूर करें सूर्य देव की आराधना

Ratha Saptami Rituals: हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति में माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को एक महान उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन संपूर्ण सृष्टि को अपने प्रकाश से आलोकित करने वाले सूर्य देव अपने स्वर्ण रथ पर सवार होकर प्रकट हुए थे। (Divine Solar Energy) के इसी अद्भुत संगम को हम ‘रथ सप्तमी’ के नाम से जानते हैं। यह दिन केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह मानव शरीर और प्रकृति के बीच ऊर्जा के गहरे संबंध को दर्शाता है। इसे ‘अचला सप्तमी’ और ‘आरोग्य सप्तमी’ जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है, जो इसके स्वास्थ्यवर्धक गुणों की ओर संकेत करते हैं।

Ratha Saptami Rituals
Ratha Saptami Rituals

जब सूर्य देव के पैर दुखे और मिला स्वर्ण रथ

रथ सप्तमी से जुड़ी एक अत्यंत रोचक कथा हमारे ग्रंथों में मिलती है। कहा जाता है कि जब सूर्य देव को निरंतर खड़े रहकर अपना कर्तव्य निभाते हुए काफी समय बीत गया, तो उनके पैरों में तीव्र वेदना होने लगी। इस समस्या के समाधान हेतु उन्होंने जगत के पालनहार भगवान विष्णु की शरण ली। श्रीहरि ने सूर्य देव के कष्ट को देखते हुए उन्हें एक दिव्य और हीरे-जवाहरात से जड़ा हुआ स्वर्ण रथ प्रदान किया। (Ratha Saptami Rituals) को पूर्ण करते हुए भगवान विष्णु ने अरुण देव को इस रथ का सारथि बनाया। जिस दिन सूर्य देव इस भव्य रथ पर पहली बार विराजमान हुए, वह माघ शुक्ल सप्तमी का ही दिन था।

सूर्य के सात घोड़ों का आध्यात्मिक रहस्य

सूर्य के रथ में सात घोड़ों का होना मात्र एक कल्पना नहीं, बल्कि एक गहरा वैज्ञानिक और ज्योतिषीय संदेश है। इन सात घोड़ों के नाम गायत्री, भ्राति, उष्निक, जगती, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति हैं, जो (Seven Colors of Spectrum) और सप्ताह के सात दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। रथ का इकलौता पहिया पूरे एक संवत्सर यानी वर्ष को दर्शाता है, जबकि उसमें लगी बारह तीलियां साल के बारह महीनों की सूचक हैं। इस बार रथ सप्तमी का रविवार के दिन पड़ना इसे और भी दुर्लभ और फलदायी बना रहा है, क्योंकि रविवार स्वयं सूर्य देव का दिन है।

मार्कंडेय पुराण और सृष्टि में प्रकाश का संचार

मार्कंडेय पुराण की कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में चारों ओर घना अंधकार छाया हुआ था। जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो उनके मुख से सबसे पहले ‘ओम्’ का उच्चारण हुआ। यह पवित्र नाद सूर्य के प्रचंड तेज का सूक्ष्म स्वरूप था। इसके बाद वेदों की उत्पत्ति हुई और वे इसी तेज में समाहित हो गए। आकाश में जो प्रत्यक्ष सूर्य हम देखते हैं, वह (Universal Light Source) के इसी ओम् शब्द का स्थूल रूप है। प्रारंभ में सूर्य का तेज इतना अधिक था कि सृष्टि जलने का भय था, तब ब्रह्मा जी की विनती पर सूर्य देव ने अपने तेज को सीमित किया ताकि जीवन फलीभूत हो सके।

माता अदिति के तप से कैसे बने ‘आदित्य’

सूर्य देव को ‘आदित्य’ क्यों कहा जाता है, इसके पीछे भी एक ममतामयी कथा है। महर्षि कश्यप की पत्नी माता अदिति ने सूर्य को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें वरदान दिया और अपनी सात मुख्य किरणों में से ‘सुषुम्ना’ नामक किरण के माध्यम से उनके गर्भ में स्थान लिया। (Incarnation of Surya) की यह प्रक्रिया जब पूर्ण हुई और माता अदिति के गर्भ से सूर्य का जन्म हुआ, वह तिथि भी माघ सप्तमी ही थी। इसी कारण उन्हें अदिति का पुत्र यानी ‘आदित्य’ पुकारा गया।

कृष्ण पुत्र सांब और आरोग्य सप्तमी का विधान

भगवान कृष्ण के पुत्र सांब की कथा हमें अहंकार के परिणामों और सूर्य उपासना की शक्ति से परिचित कराती है। सांब को अपनी शारीरिक सुंदरता पर बहुत घमंड था, जिसके चलते उन्होंने दुर्बल दिख रहे दुर्वासा ऋषि का उपहास उड़ाया। क्रोधित होकर ऋषि ने सांब को कुष्ठ रोगी होने का शाप दे दिया। जब कोई औषधि काम नहीं आई, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें (Healing Power of Sun) का मार्ग दिखाया। सांब ने पूरी निष्ठा से सूर्य की आराधना की और उन्हें भयानक चर्म रोग से मुक्ति मिली। इसी कारण इस दिन को आरोग्य प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ अवसर माना जाता है।

दान और स्नान से दूर होंगे कुंडली के दोष

रथ सप्तमी के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने और सूर्य देव को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक और समस्त ग्रहों का राजा माना गया है। यदि किसी की कुंडली में (Astrological Sun Remedies) की आवश्यकता है, तो इस दिन सूर्य से संबंधित वस्तुओं जैसे तांबा, गुड़, गेहूं और लाल वस्त्रों का दान करना अत्यंत शुभ होता है। इस दिन न केवल सूर्य बल्कि उनके रथ के सातों घोड़ों की भी पूजा की जाती है, जो भक्त के जीवन में गति और प्रगति का संचार करते हैं।

सफलता और उच्च पद प्राप्ति का अचूक मार्ग

सूर्य देव को प्रशासन, उच्च अधिकारियों और पिता का प्रतीक माना जाता है। जो लोग अपने कार्यक्षेत्र में मान-सम्मान और उच्च पद की अभिलाषा रखते हैं, उनके लिए रथ सप्तमी की पूजा (Success and Recognition) के द्वार खोलती है। इस दिन आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से शत्रु बाधा दूर होती है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य बिना रुके संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है, हमें भी अपने जीवन में निरंतरता और अनुशासन के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

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