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Jharkhand High Court: ईंट भट्ठा मालिकों की दादागिरी खत्म! हाईकोर्ट ने सुनाया तगड़ा फरमान, मिट्टी निकाली तो…

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश के ईंट भट्ठा संचालकों को एक बड़ा झटका देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब मनमर्जी से मिट्टी का उत्खनन नहीं चलेगा। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि ईंट निर्माण के लिए जमीन से मिट्टी निकालने से पहले संचालकों को (Environmental Clearance Regulations) का सख्ती से पालन करना होगा। अब बिना पर्यावरण स्वीकृति और झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति यानी सीटीओ (Consent to Operate) के कोई भी भट्ठा संचालित नहीं किया जा सकेगा।

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मिट्टी भी है खनिज: अदालत का बड़ा स्पष्टीकरण

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ किया कि ईंट बनाने में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी कोई साधारण वस्तु नहीं, बल्कि ‘लघु खनिज’ (Jharkhand High Court) की श्रेणी में आती है। अदालत ने कहा कि मिट्टी निकालने और ईंट बनाने की प्रक्रिया को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। इस (Legal Mineral Classification) के आधार पर अब झारखंड माइनर मिनरल कंसेशन रूल्स 2004 के सभी प्रावधान इन भट्ठा संचालकों पर पूरी तरह प्रभावी होंगे।


ईंट भट्ठा संचालकों की दलीलें खारिज

भट्ठा संचालकों ने अदालत में याचिका दायर कर यह दावा किया था कि मिट्टी निकालना खनन की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए उन्हें पर्यावरण एनओसी की जरूरत नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस (Petitioner Legal Argument) को सिरे से खारिज कर दिया। संचालकों का तर्क था कि उनसे डीएमएफटी (डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट) का भुगतान भी नहीं लिया जाना चाहिए, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह खनन है, इसलिए उन्हें कमाई का निर्धारित हिस्सा सरकारी खजाने में जमा करना ही होगा।


पर्यावरण पर पड़ता है गहरा दुष्प्रभाव

अदालत ने अपने फैसले में पर्यावरण संरक्षण को सर्वोपरि रखते हुए कहा कि मिट्टी पर्यावरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब बड़े पैमाने पर ईंटों के लिए (Soil Excavation Impact) होता है, तो उसका सीधा असर भूमि की उर्वरता, जल स्तर और वायु गुणवत्ता पर पड़ता है। पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों का पालन किया जाए ताकि भविष्य में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।


वन सीमा के पास अब नहीं चलेगा क्रशर

हाईकोर्ट ने वनों की सुरक्षा को लेकर भी एक बड़ा आदेश जारी किया है। अदालत ने राज्य में संरक्षित वन सीमा के एक किलोमीटर के दायरे में किसी भी तरह के पत्थर खनन या स्टोन क्रशर के संचालन पर (Mining Exclusion Zone) का निर्देश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि इस बफर जोन में अब किसी भी नयी खदान या क्रशर के लिए अनुमति नहीं दी जाएगी, ताकि जंगलों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रदूषण और अवैध मानवीय गतिविधियों से बचाया जा सके।


पुराने लाइसेंसों का होगा दोबारा सर्वे

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश देते हुए अदालत ने कहा कि यदि पूर्व में वन सीमा के करीब ऐसी कोई अनुमति दी गई है, तो उसका तत्काल (Authorized Mining Survey) किया जाए। बोर्ड को उन सभी खदानों और क्रशरों की सूची कोर्ट में पेश करनी होगी जो वर्तमान में एक किलोमीटर के दायरे में चल रहे हैं। सूची मिलने के बाद अदालत इन पुराने लाइसेंसों को रद्द करने या उन पर रोक लगाने के संबंध में आगे का फैसला सुनाएगी।


डीएमएफटी फंड में जमा करना होगा पैसा

ईंट भट्ठा संचालकों के लिए अब वित्तीय जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। अदालत के आदेशानुसार, उन्हें अब अपने लाभ का एक हिस्सा डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट में (District Mineral Development Fund) के रूप में अनिवार्य रूप से देना होगा। इस राशि का उपयोग उन क्षेत्रों के विकास और वहां रहने वाले लोगों के कल्याण के लिए किया जाएगा जो खनन गतिविधियों के कारण प्रभावित होते हैं। यह फैसला स्थानीय समुदायों के हक में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।


प्रदूषण बोर्ड को मिली निगरानी की जिम्मेदारी

अदालत ने झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया कि वे राज्य में हो रहे अवैध खनन पर कड़ी नजर रखें। बोर्ड को (Pollution Control Monitoring) को सुदृढ़ करने और एक किलोमीटर के बफर जोन में किसी भी अवैध गतिविधि को रोकने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण नियमों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों और संचालकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।


केंद्र के नियमों का पालन है अनिवार्य

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि केंद्र सरकार बहुत पहले ही ईंट निर्माण की मिट्टी को लघु खनिज घोषित कर चुकी है। हाईकोर्ट ने कहा कि (Central Government Mineral Policies) के होते हुए राज्य में किसी अन्य व्याख्या की गुंजाइश नहीं बचती। ऐसे में संचालकों को खनिज से जुड़े हर नियम का पालन करना होगा, चाहे वह खनन पट्टा हो या रॉयल्टी का भुगतान। अदालत ने कहा कि नियम सभी के लिए बराबर हैं और किसी को भी विशेष छूट नहीं दी जा सकती।


अवैध खनन पर कोर्ट की पैनी नजर

झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य में अवैध उत्खनन को रोकने और पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। (Sustainable Mining Practices) को बढ़ावा देने के लिए अदालत ने यह कड़ा रुख अपनाया है। ईंट भट्ठा संचालकों की याचिका खारिज होने के बाद अब प्रशासन को उम्मीद है कि पर्यावरण मानकों का बेहतर ढंग से पालन होगा और सरकारी राजस्व में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जाएगी।

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