IDBIBank – रणनीतिक विनिवेश पर सरकार ने फिलहाल रोकी हिस्सेदारी बिक्री प्रक्रिया
IDBIBank – आईडीबीआई बैंक से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार केंद्र सरकार ने फिलहाल इस बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि रणनीतिक विनिवेश के तहत प्राप्त वित्तीय बोलियां तय किए गए रिजर्व मूल्य से कम थीं। विनिवेश से जुड़े नियमों के अनुसार यदि बोली रिजर्व प्राइस से कम हो तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सरकार ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय फिलहाल रोकने का फैसला किया है। इस घटनाक्रम के बाद बैंकिंग और निवेश क्षेत्र में इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

रिजर्व प्राइस से कम मिली वित्तीय बोलियां
रिपोर्टों के अनुसार आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी खरीदने के लिए जो वित्तीय बोलियां जमा की गई थीं, वे सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम मूल्य से कम थीं। विनिवेश की प्रक्रिया में रिजर्व प्राइस उस न्यूनतम मूल्य को कहा जाता है जिसके नीचे सरकार किसी हिस्सेदारी को बेचने के लिए तैयार नहीं होती। ऐसे में कम कीमत वाली बोली स्वीकार करना नियमों के अनुरूप नहीं होता। बताया जा रहा है कि निर्धारित रिजर्व प्राइस बैंक के प्राइस टू बुक वैल्यूएशन के आधार पर तय किया गया था, जिसे बाजार के कुछ विश्लेषक अपेक्षाकृत अधिक मान रहे थे।
किन कंपनियों ने दिखाई थी दिलचस्पी
आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी खरीदने के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय और घरेलू संस्थानों ने दिलचस्पी दिखाई थी। रिपोर्टों के अनुसार फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स और एमिरेट्स एनबीडी उन प्रमुख बोलीदाताओं में शामिल थे जिन्होंने फरवरी में अपनी वित्तीय बोलियां जमा की थीं। इसके अलावा कोटक महिंद्रा बैंक को भी संभावित बोलीदाताओं की सूची में शामिल किया गया था। हालांकि बाद में कोटक महिंद्रा बैंक ने संकेत दिया था कि वह इस प्रक्रिया में आगे हिस्सा नहीं लेगा।
सरकार और एलआईसी की मौजूदा हिस्सेदारी
वर्तमान समय में आईडीबीआई बैंक में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम दोनों की बड़ी हिस्सेदारी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बैंक में केंद्र सरकार के पास लगभग 45.48 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि एलआईसी के पास करीब 49.24 प्रतिशत शेयर हैं। प्रस्तावित विनिवेश योजना के तहत सरकार और एलआईसी मिलकर कुल 60.70 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में थे। इस योजना में सरकार की लगभग 30.48 प्रतिशत और एलआईसी की करीब 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बिक्री के लिए प्रस्तावित थी।
विनिवेश के बाद संरचना में संभावित बदलाव
यदि यह विनिवेश प्रक्रिया सफल होती तो बैंक के स्वामित्व ढांचे में बड़ा बदलाव देखने को मिलता। प्रस्ताव के अनुसार हिस्सेदारी बिक्री के बाद सरकार के पास लगभग 15 प्रतिशत और एलआईसी के पास करीब 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बचती। इससे बैंक में रणनीतिक निवेशक की भागीदारी बढ़ जाती और बैंकिंग क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका मजबूत होती। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा पूरा हो जाता तो यह देश के बैंकिंग क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े निजीकरण प्रयासों में से एक माना जाता।
प्रक्रिया की शुरुआत और पृष्ठभूमि
इस विनिवेश प्रक्रिया की शुरुआत डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट द्वारा की गई थी। जनवरी 2025 में संभावित निवेशकों से रुचि अभिव्यक्ति आमंत्रित की गई थी। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से बोलीदाताओं का चयन और वित्तीय प्रस्तावों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। सरकार और एलआईसी दोनों का उद्देश्य बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करना था ताकि रणनीतिक निवेशक को नियंत्रण का अवसर मिल सके।
शेयर बाजार में दिखा असर
इस खबर का असर शेयर बाजार में भी देखने को मिला। हाल ही में कारोबारी सत्र के दौरान आईडीबीआई बैंक के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई थी। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन बैंक का शेयर लगभग 6.69 प्रतिशत की गिरावट के साथ 92.20 रुपये के स्तर पर बंद हुआ। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि विनिवेश प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है।



