TariffPolicy – भारत पर शुल्क को लेकर ट्रंप सरकार पर सवाल
TariffPolicy – अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिकी सांसद ब्रैड शर्मन ने आरोप लगाया है कि ट्रंप प्रशासन भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के लिए नए कारण तलाश रहा है। उनका कहना है कि भारत को अलग से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि समान परिस्थितियों वाले अन्य देशों के प्रति वैसी सख्ती नहीं दिखाई गई। यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में भारत पर लगाए गए शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की गई थी।

भारत को लेकर दोहरा रवैया?
ब्रैड शर्मन ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ट्रंप भारत पर और अधिक टैरिफ लगाने का आधार ढूंढ रहे हैं और इसका तर्क रूसी तेल आयात से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि हंगरी अपनी लगभग 90 प्रतिशत तेल जरूरतें रूस से पूरी करता है, फिर भी उस पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया गया। इसी तरह चीन, जो रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता है, उसे भी इस आधार पर दंडित नहीं किया गया। ऐसे में भारत पर अलग से सख्ती को लेकर उन्होंने सवाल उठाए हैं।
भारत के आयात का वास्तविक आंकड़ा
सांसद के मुताबिक भारत रूस से करीब 21 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो अन्य देशों की तुलना में कम है। उनका तर्क है कि अमेरिका को अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ संतुलित नीति अपनानी चाहिए। उन्होंने ट्रंप प्रशासन से अपील की कि भारत के खिलाफ अपनाई गई नीति की समीक्षा की जाए और व्यापार संबंधों को अनावश्यक दबाव से बचाया जाए। यह बयान दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जनवरी में निर्यात में गिरावट
वाणिज्य मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के अनुसार, जनवरी महीने में अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात 21.77 प्रतिशत घटकर 6.6 अरब डॉलर रह गया। इससे पहले सितंबर, अक्टूबर और दिसंबर में भी गिरावट दर्ज की गई थी, जबकि नवंबर में अस्थायी बढ़त देखी गई थी। दूसरी ओर, अमेरिका से आयात 23.71 प्रतिशत बढ़कर 4.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि व्यापार संतुलन पर दबाव बना हुआ है और टैरिफ नीति का असर आंकड़ों में दिखाई दे रहा है।
शुल्क में बदलाव और अंतरिम समझौता
अमेरिका ने 27 अगस्त से भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक का शुल्क लागू किया था। हालांकि हाल में दोनों देशों के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते पर सहमति बनी है। इसके तहत सात फरवरी से 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क हटा दिया गया और जवाबी शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया। इसे अस्थायी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान अभी बाकी है।
अमेरिकी उपभोक्ताओं पर बढ़ता बोझ
टैरिफ को लेकर एक नई आर्थिक रिपोर्ट ने भी बहस छेड़ दी है। पहले यह दावा किया गया था कि आयात शुल्क का असर विदेशी कंपनियों पर पड़ेगा, लेकिन फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क से जुड़े अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण में सामने आया कि लगभग 90 प्रतिशत बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों ने ही उठाया। इसका मतलब है कि आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ने से सीधे तौर पर घरेलू बाजार प्रभावित हुआ।
टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में हर अमेरिकी परिवार पर औसतन 1000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा। अनुमान है कि 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 1300 डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या टैरिफ नीति वास्तव में रणनीतिक लाभ दे रही है या घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा रही है।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों की दिशा
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं, लेकिन हाल की घटनाओं ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के लिए स्थिर और पूर्वानुमेय व्यापार नीति आवश्यक है। यदि शुल्क और प्रतिबंधों को लेकर स्पष्टता नहीं रही, तो इसका असर निवेश और द्विपक्षीय व्यापार पर पड़ सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नीति में किस तरह के बदलाव होते हैं और क्या दोनों पक्ष स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ते हैं।



