CelebrityNews – विक्रांत मैसी के फैसले ने पेरेंटिंग और पहचान पर छेड़ी नई बहस
CelebrityNews – बॉलीवुड अभिनेता विक्रांत मैसी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अभिनय की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले विक्रांत जितने संजीदा कलाकार माने जाते हैं, उतने ही सुलझे हुए इंसान भी। हाल के दिनों में वह अपनी फिल्मों से ज्यादा अपने निजी जीवन से जुड़े एक फैसले को लेकर चर्चा में हैं। यह फैसला उनके बेटे वरदान के जन्म से जुड़ा है, जिसने समाज में पहचान, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर नई बातचीत को जन्म दिया है।

बेटे के जन्म से जुड़ा एक सोच-समझकर लिया गया निर्णय
विक्रांत मैसी और उनकी पत्नी शीतल ठाकुर के घर 7 फरवरी 2024 को बेटे वरदान का जन्म हुआ। आमतौर पर जन्म प्रमाण पत्र से जुड़ी प्रक्रिया को लोग एक औपचारिकता मानते हैं, लेकिन इस बार एक अलग बात सामने आई। कपल ने अपने बेटे के बर्थ सर्टिफिकेट में ‘धर्म’ से संबंधित कॉलम जानबूझकर खाली छोड़ा। यह फैसला कोई जल्दबाजी में नहीं, बल्कि पूरी सोच और अनुभव के साथ लिया गया कदम था।
इंटरव्यू में खुद बताई वजह
हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में विक्रांत मैसी ने इस फैसले के पीछे की वजह खुलकर साझा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत सरकार की ओर से नागरिकों को यह विकल्प दिया जाता है कि वे दस्तावेजों में धर्म का उल्लेख करना चाहें या नहीं। विक्रांत के अनुसार, जब सिस्टम खुद यह आज़ादी देता है, तो उसका उपयोग करना हर नागरिक का अधिकार है। उन्होंने कहा कि यह कोई विरोध या बयान नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत और संवैधानिक विकल्प है।
धार्मिक पहचान से जुड़ा निजी अनुभव
विक्रांत ने बातचीत के दौरान अपने पारिवारिक अनुभवों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वह एक बहुसांस्कृतिक परिवार से आते हैं, जहां अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमियों का मेल रहा है। इसी दौरान उन्होंने धार्मिक मतभेदों और तनाव के नकारात्मक पहलुओं को भी करीब से देखा है। उनके अनुसार, यही अनुभव उन्हें यह सोचने पर मजबूर करता है कि उनके बच्चे पर किसी भी तरह की पहचान थोपने की जल्दबाजी न की जाए।
सिस्टम में आए बदलावों का दिया उदाहरण
अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए विक्रांत मैसी ने भारतीय व्यवस्था में आए सकारात्मक बदलावों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने उदाहरण दिया कि आज सिंगल महिलाओं के लिए पासपोर्ट बनवाते समय पति का नाम लिखना अनिवार्य नहीं रहा। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सिस्टम अब व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी फैसलों का सम्मान करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपने बेटे से जुड़ा यह निर्णय लिया।
बच्चे को अपना रास्ता चुनने की आज़ादी
विक्रांत का मानना है कि पहचान कोई ऐसी चीज नहीं होनी चाहिए, जो जन्म के साथ ही तय कर दी जाए। उनके अनुसार, जब उनका बेटा बड़ा होगा, समझ विकसित करेगा और दुनिया को अपने नजरिए से देखेगा, तब उसे यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने विश्वास और पहचान को खुद चुने। उन्होंने साफ कहा कि माता-पिता का काम बच्चे को सुरक्षित माहौल देना है, न कि उसके लिए हर निर्णय पहले से तय कर देना।
समाज में उठते सवाल और सकारात्मक बहस
इस फैसले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कुछ लोग इसे साहसिक और प्रगतिशील कदम मान रहे हैं, तो कुछ इसे परंपराओं से हटकर उठाया गया फैसला बता रहे हैं। हालांकि, ज्यादातर चर्चाओं का केंद्र यही है कि आज के दौर में पेरेंटिंग सिर्फ परवरिश तक सीमित नहीं, बल्कि सोच और मूल्यों को लेकर भी एक जिम्मेदारी बन चुकी है।
निजी फैसला, सार्वजनिक संदेश
विक्रांत मैसी बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि यह फैसला किसी एजेंडे या प्रचार का हिस्सा नहीं है। यह उनके परिवार से जुड़ा एक निजी निर्णय है, जो उन्होंने अपने अनुभव, सोच और देश के कानून के दायरे में रहकर लिया है। लेकिन अनजाने में ही यह कदम समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि पहचान, धर्म और स्वतंत्रता को लेकर हम कितने खुले हैं।



