AlzheimerRisk – प्रदूषण से बढ़ता याददाश्त कमजोर होने का खतरा
AlzheimerRisk – देश में बढ़ते प्रदूषण का असर अब केवल फेफड़ों और दिल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे दिमागी सेहत को भी प्रभावित कर रहा है। हाल में सामने आए एक शोध से संकेत मिले हैं कि हवा, पानी और भोजन के जरिए शरीर में पहुंचने वाली भारी धातुएं मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर असर डाल सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन तत्वों का असंतुलन सोचने-समझने की क्षमता और याददाश्त को कमजोर कर सकता है, खासकर बुजुर्गों में इसका खतरा अधिक देखा गया है।

एम्स के शोध में सामने आए अहम संकेत
दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के बायोफिजिक्स विभाग ने अन्य विभागों के चिकित्सकों के साथ मिलकर यह अध्ययन किया। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है। शोध दल का नेतृत्व कर रहीं प्रोफेसर डॉ. शर्मिष्ठा डे ने बताया कि अध्ययन के दौरान 60 वर्ष से अधिक आयु के 65 प्रतिभागियों के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया गया। इनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्हें याददाश्त संबंधी समस्याएं थीं और वे भी जो सामान्य स्वास्थ्य स्थिति में थे। जांच के दौरान दोनों समूहों के बीच स्पष्ट अंतर देखने को मिला, जिसने शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया।
खून की जांच में बढ़े हुए धातु स्तर
अध्ययन में पाया गया कि जिन बुजुर्गों को भूलने की बीमारी या स्मृति क्षीण होने की समस्या थी, उनके रक्त में कुछ विशेष धातुओं का स्तर सामान्य से अधिक था। इनमें लिथियम, एल्युमिनियम, वैनेडियम, मैंगनीज, कोबाल्ट, निकेल, जिंक और सिल्वर जैसी धातुएं शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में शरीर, विशेषकर मस्तिष्क, इन तत्वों के स्तर को नियंत्रित रखता है। लेकिन जब पर्यावरणीय कारणों से इनकी मात्रा लगातार बढ़ती रहती है, तो संतुलन बिगड़ सकता है। यही असंतुलन तंत्रिका कोशिकाओं पर दबाव डालता है और लंबे समय में अल्जाइमर जैसी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है।
पर्यावरणीय कारणों से बढ़ रही समस्या
शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि औद्योगिकीकरण, रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता उपयोग और अपशिष्ट जल प्रबंधन की कमी ने मिट्टी, जल और वायु को प्रभावित किया है। कई क्षेत्रों में भूजल में भारी धातुओं की मात्रा बढ़ने की रिपोर्ट सामने आई है। यही पानी सिंचाई में उपयोग होता है और फलों, सब्जियों व अनाज के जरिए ये तत्व भोजन श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं। इसके अलावा वायु प्रदूषण के जरिए भी सूक्ष्म कण शरीर में पहुंचते हैं। लगातार संपर्क में रहने से ये तत्व शरीर में जमा हो सकते हैं और धीरे-धीरे तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।
मस्तिष्क की स्वाभाविक नियंत्रण क्षमता
विशेषज्ञों के अनुसार, मानव शरीर में जैविक तत्वों और धातुओं का संतुलन बनाए रखने की एक स्वाभाविक प्रणाली होती है। मस्तिष्क भी इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है। फिर भी यदि लंबे समय तक बाहरी स्रोतों से इन तत्वों की अधिक मात्रा शरीर में प्रवेश करती रहे, तो नियंत्रण प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इससे न्यूरॉन्स की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, जो याददाश्त और निर्णय क्षमता से सीधे जुड़ी होती है। यही कारण है कि शोधकर्ता इसे केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चुनौती मान रहे हैं।
बड़े स्तर पर आगे बढ़ेगा अध्ययन
डॉ. डे ने जानकारी दी कि प्रारंभिक निष्कर्षों के बाद अब इस विषय पर व्यापक स्तर पर अध्ययन की तैयारी की जा रही है। इसमें अन्य शहरों के अस्पतालों और शोध संस्थानों को भी शामिल किया जाएगा ताकि विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, तो जोखिम को कम किया जा सकता है। साथ ही, प्रदूषण नियंत्रण और सुरक्षित पेयजल व्यवस्था को लेकर नीतिगत स्तर पर भी गंभीर प्रयास जरूरी हैं।



