Respiratory Problem: सावधान! सामने आई सांस की धोखेबाज बीमारी, 40% COPD मरीज़ों ने कभी नहीं किया धूम्रपान…
Respiratory Problem: आज के दौर में जीवनशैली और खान-पान में आई गंभीर अनियमितताओं के कारण क्रॉनिक बीमारियों की रफ्तार अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। इसमें सबसे चिंताजनक बढ़ोतरी पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण आई है, जिसने बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी आयु वर्ग के लोगों में सांस से संबंधित समस्याओं के मामलों को तेजी से उभारा है। विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि बच्चों में अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसी श्वसन संबंधी बीमारियाँ अब महामारी का रूप ले रही हैं। चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि इन गंभीर फेफड़ों की स्थितियों की शुरुआत अब कम उम्र में ही हो रही है।

बढ़ते वायु प्रदूषण का प्रभाव
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग नब्बे प्रतिशत आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जो सुरक्षित मानकों पर खरी नहीं उतरती। भारत के कई प्रमुख शहरों में, विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में, वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर 200 से 400 के खतरनाक स्तर पर बना रहता है। वैज्ञानिक शोधों ने पुष्टि की है कि खराब वायु गुणवत्ता का लगातार संपर्क समग्र स्वास्थ्य, विशेष रूप से फेफड़ों के लिए, बेहद नुकसानदायक है। जबकि पारंपरिक रूप से सिगरेट स्मोकिंग को इन श्वसन रोगों (Respiratory Problem) का प्राथमिक कारण माना जाता रहा है, अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जो लोग धूम्रपान नहीं करते, वे भी COPD के जोखिम पर हैं?
बच्चों में श्वसन रोगों की बढ़ती दर
चिकित्सकों का कहना है कि अस्थमा और COPD जैसी सांस की बीमारियाँ, जिन्हें पहले बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्या माना जाता था, अब बच्चों में भी तेजी से बढ़ रही हैं। शोध अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि जिन बच्चों को बचपन में बार-बार सर्दी-खांसी या गंभीर एलर्जिक रिएक्शन्स का सामना करना पड़ा है, उनमें आगे चलकर अस्थमा या COPD विकसित होने की आशंका काफी अधिक होती है। यह प्रवृत्ति एक स्पष्ट संकेत है कि आनुवंशिक कारकों के साथ-साथ पर्यावरणीय कारक अब फेफड़ों के स्वास्थ्य को कम उम्र में ही प्रभावित कर रहे हैं। इस संदर्भ में, यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या धूम्रपान न करने वाले वयस्कों में भी सांस की समस्याएँ होने का खतरा बना रहता है।
नॉन-स्मोकर्स में COPD का जोखिम
मेडिकल रिकॉर्ड्स और हालिया शोध इस पुरानी धारणा को चुनौती देते हैं कि COPD केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी है। कई विस्तृत अध्ययनों से यह सामने आया है कि भारत में COPD से पीड़ित लगभग चालीस से पैंतालीस प्रतिशत रोगियों के पास धूम्रपान का कोई मेडिकल इतिहास नहीं है। इस तथ्य से साफ है कि नॉन-स्मोकर्स में भी COPD, अस्थमा और अन्य गंभीर श्वसन बीमारियों का खतरा मौजूद है। इसके पीछे कुछ विशिष्ट और खतरनाक पर्यावरणीय कारणों को जिम्मेदार ठहराया गया है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
इनडोर और आउटडोर प्रदूषण का खतरा
नॉन-स्मोकर्स में फेफड़ों को नुकसान पहुँचाने वाले प्रमुख कारकों में इनडोर और आउटडोर प्रदूषण शामिल है। ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में, खाना पकाने के लिए लकड़ी, कोयला, गोबर के उपले या पुराने चूल्हों के धुएँ का लगातार संपर्क फेफड़ों की आंतरिक संरचना को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करता है। इसके अलावा, बाहरी वायु प्रदूषण में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण सीधे फेफड़ों में प्रवेश कर क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन (Chronic Inflammation) पैदा करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सांस लेने में दिक्कतें उत्पन्न होती हैं। डॉक्टरों का यह भी कहना है कि बचपन में बार-बार और गंभीर फेफड़ों के संक्रमण होने से फेफड़ों की संरचना कमजोर हो जाती है, जो भविष्य में सांस की समस्याओं की नींव रखती है।
बीमारी की पहचान में देरी
डॉक्टर इस बात पर जोर देते हैं कि यह मानना एक बड़ी गलती है कि सिर्फ सिगरेट स्मोकिंग ही COPD का एकमात्र कारण है। वास्तव में, प्रदूषण और सभी प्रकार के धुएँ के संपर्क को अब फेफड़ों की इन क्रॉनिक बीमारियों का मुख्य ट्रिगर माना जा रहा है। धूम्रपान न करने वाले लोगों में, इन बीमारियों की पहचान अक्सर देर से हो पाती है क्योंकि वे और उनके चिकित्सक दोनों ही स्मोकिंग हिस्ट्री न होने के कारण इन बीमारियों के प्रति कम संशयशील होते हैं। विलंबित पहचान अक्सर उपचार को जटिल बना देती है और रोग की प्रगति को बढ़ा देती है।
श्वसन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक उपाय
चिकित्सक सलाह देते हैं कि अस्थमा, COPD और बार-बार होने वाले श्वसन संक्रमण से बचाव के लिए सबसे पहला कदम अपने परिवेश (Environment) को स्वस्थ और साफ रखना है। खराब वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) वाले दिनों में, बिना किसी फेस मास्क के घर से बाहर निकलना संक्रमण के खतरे को बढ़ा सकता है। इसलिए, बाहर निकलते समय उच्च गुणवत्ता वाले N95 मास्क का उपयोग करना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, घर के भीतर एक एयर प्यूरीफायर (Air Purifier) का उपयोग करना और उचित वेंटिलेशन (Ventilation) की व्यवस्था करना भी अनिवार्य है। श्वसन संक्रमण से बचने के लिए नियमित रूप से हाथ धोना, अत्यधिक भीड़भाड़ वाले स्थानों से दूरी बनाए रखना और एक संतुलित आहार (Balanced Diet) का सेवन करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।



