ChagosDispute – मॉरीशस ने मालदीव से तोड़े राजनयिक संबंध
ChagosDispute – हिंद महासागर क्षेत्र में उभरते भू-राजनीतिक तनाव के बीच मॉरीशस ने एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाते हुए मालदीव के साथ अपने राजनयिक संबंध तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं। यह निर्णय चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर मालदीव के बदले रुख के बाद लिया गया है। दोनों देश लंबे समय से मित्र राष्ट्र माने जाते रहे हैं, ऐसे में यह घटनाक्रम क्षेत्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विवाद की जड़ में चागोस द्वीप समूह
मॉरीशस के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि मालदीव ने हाल में चागोस द्वीप समूह को लेकर अपना आधिकारिक रुख बदल दिया है। अब मालदीव, मॉरीशस की क्षेत्रीय संप्रभुता को मान्यता नहीं दे रहा है। साथ ही उसने मॉरीशस और यूनाइटेड किंगडम के बीच हुए हालिया समझौते पर भी आपत्ति जताई है।
इसी पृष्ठभूमि में मॉरीशस की कैबिनेट ने संबंध निलंबित करने का फैसला किया और इसकी औपचारिक सूचना मालदीव सरकार को दे दी गई।
मॉरीशस का आधिकारिक बयान
विदेश मंत्रालय ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह कदम राष्ट्रीय हितों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा क्षेत्रीय स्थिरता के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। सरकार ने स्पष्ट किया कि चागोस और डिएगो गार्सिया से जुड़े कानूनी व कूटनीतिक पहलुओं पर भी विस्तृत समीक्षा की जा रही है।
तनाव तब और बढ़ गया जब मालदीव के राष्ट्रपति ने अपने ‘स्टेट ऑफ द नेशन’ संबोधन में चागोस द्वीपसमूह पर मालदीव के दावे को दोहराया। उन्होंने 2022 में पूर्व सरकार द्वारा मॉरीशस की संप्रभुता को दी गई मान्यता को वापस लेने की घोषणा की। मालदीव का कहना है कि यह कदम उसके समुद्री हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है।
चागोस विवाद का ऐतिहासिक संदर्भ
चागोस द्वीप समूह 60 से अधिक छोटे द्वीपों का समूह है, जो हिंद महासागर के मध्य में स्थित है। इसका सबसे बड़ा द्वीप डिएगो गार्सिया है, जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
1965 में, मॉरीशस की स्वतंत्रता से पहले, ब्रिटेन ने चागोस को उससे अलग कर ब्रिटिश-हिंद महासागर क्षेत्र का हिस्सा बना दिया। मॉरीशस का दावा है कि यह अलगाव दबाव में कराया गया था और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं था।
बाद में डिएगो गार्सिया को अमेरिका को सैन्य अड्डे के रूप में पट्टे पर दे दिया गया। इस प्रक्रिया के दौरान हजारों स्थानीय निवासियों को द्वीप से हटाया गया, जो मानवाधिकार के मुद्दे के रूप में भी उभरा।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
2019 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने सलाहकारी राय देते हुए कहा कि चागोस को मॉरीशस से अलग करना वैध नहीं था और ब्रिटेन को इसे लौटाने की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी इसी आशय का प्रस्ताव पारित किया।
हाल के वर्षों में ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच समझौते की दिशा में प्रगति हुई है, जिसके तहत संप्रभुता मॉरीशस को हस्तांतरित करने की सहमति बनी, जबकि डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य उपस्थिति जारी रहने की व्यवस्था की गई।
मालदीव की आपत्ति और समुद्री सीमा मुद्दा
मालदीव और चागोस के बीच समुद्री सीमा को लेकर भी विवाद रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण ने पहले मॉरीशस के पक्ष में निर्णय दिया था। हालांकि अब मालदीव सरकार ने इस पर पुनर्विचार का संकेत दिया है और ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल दोनों देशों के बीच संवाद की संभावनाओं पर निगाहें टिकी हैं।



