अंतर्राष्ट्रीय

Human-rights: जहां राइफल नहीं, सीधे मौत बरस रही थी, नाइजीरिया में सेना के ‘कत्लेआम’ से स्तब्ध हुई दुनिया

Human-rights: नाइजीरिया के अदामावा राज्य में एक ऐसी भयावह सुबह देखने को मिली, जिसने पूरे क्षेत्र को दहला दिया। लामुर्दे इलाके की सड़कों पर महिलाएं शांतिपूर्ण विरोध कर रही थीं, लेकिन अचानक सब कुछ बदल गया जब सुरक्षा बलों ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल का प्रयोग किया। इस गोलीबारी में नौ महिलाओं की मौत ने पूरे समुदाय को सदमे में डाल दिया। गवाहों का कहना है कि प्रदर्शनकारी सिर्फ आवाज उठाना चाहती थीं, लेकिन उनकी चीखें गोलियों की आवाज़ में दब गईं। इस पूरे घटनाक्रम ने सरकार की Security रणनीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए।

Human-rights
Human-rights
WhatsApp Group Join Now

सड़क पर विरोध और गोलियों की गूंज

लामुर्दे की मुख्य सड़क पर जमा महिलाएं सेना के संचालन के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध दिखा रही थीं। उनका आरोप था कि सेना सांप्रदायिक झड़पों को नियंत्रित करने में असफल रही है। जब सैनिकों का काफ़िला वहां से गुजरने की कोशिश कर रहा था, तो विरोध कर रही भीड़ को हटाने के लिए गोलियां चला दी गईं। इस गोलीबारी में कई लोग घायल भी हुए। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रदर्शनकारियों का इरादा सिर्फ अपनी बात प्रशासन तक पहुंचाने का था, लेकिन जवाब मिला बंदूक की नली से। इस घटना ने सेना के Action पर बहस छेड़ दी है।


सेना का पलटवार: जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा

नाइजीरियाई सेना ने इस घटना के लिए खुद को बिल्कुल जिम्मेदार नहीं माना। सेना का दावा है कि गोलीबारी किसी स्थानीय मिलिशिया ने की थी, और महिलाओं की मौतों के लिए वही जिम्मेदार हैं। लेकिन दूसरी ओर, एमनेस्टी इंटरनेशनल नाइजीरिया ने जांच के बाद कहा कि फायरिंग सेना ने ही की थी। इतने बड़े आरोपों के बाद भी सेना का पीछे हटना और मिलिशिया पर दोष मढ़ना इलाके के लोगों को स्वीकार नहीं। इस विवाद ने सेना की Accountability पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।


इतिहास दोहराता नाइजीरिया

नाइजीरिया में विरोध प्रदर्शनों पर हिंसा कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई बार सेना पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे हैं। 2020 में लागोस के लेकी टोल गेट पर पुलिस क्रूरता के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन ने दुनिया का ध्यान खींचा था, जब सैनिकों ने भीड़ पर गोलियां चलाई थीं। उस घटना को जांच आयोग ने ‘नरसंहार’ बताया था। इतिहास की ये परतें बताती हैं कि विरोध को कुचलने का तरीका एक जैसी पैटर्न में होता आया है, चाहे मामला छोटा हो या बड़ा। यही वजह है कि आज फिर देश में Human-rights पर चर्चा तेज है।


आखिर क्यों भड़का लोगों का गुस्सा?

इस बार के विरोध की वजह थी दो जातीय समूह—बाचामा और चोबो—के बीच ज़मीन को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद। लगातार हो रही झड़पों से लोग परेशान थे, लेकिन अधिकारियों द्वारा लगाए गए कर्फ्यू के बावजूद भी हिंसा रुक नहीं रही थी। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि सुरक्षा बल कर्फ्यू को लागू करने में लापरवाह हैं, जिससे टकराव बढ़ता जा रहा है। जनता चाहती थी कि सुरक्षा बल मामले को गंभीरता से लें, लेकिन इसके बजाय उन्हें मिला केवल दमन। इस स्थिति ने प्रशासन की Response क्षमता पर सवाल उठा दिए हैं।


एक मां का दर्द, जिसने बेटी को खो दिया

ग्येले कैनेडी जैसी कई माताओं का दर्द आज पूरे नाइजीरिया को झकझोर रहा है। उनकी बेटी भी उन्हीं महिलाओं में शामिल थी, जो वहां न्याय की मांग कर रही थीं। कैनेडी बताती हैं कि पहले तो हवा में एक चेतावनी गोली चली, लेकिन जैसे ही महिलाएं नहीं हटीं, सैनिकों ने सीधे फायरिंग शुरू कर दी। एक पल में विरोध की आवाजें कराहों में बदल गईं। उन्होंने अपनी बेटी को खो दिया, और अभी भी समझ नहीं पा रही हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का जवाब मौत क्यों बनी। उनकी कहानी नाइजीरिया की Truth को उजागर करती है।


 ट्रंप की नजर में जांच के घेरे में सेना

यह घटना ऐसे समय पर हुई है, जब नाइजीरियाई सेना पहले से ही अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर है। ट्रंप ने आरोप लगाया था कि नाइजीरिया में ईसाइयों को टारगेट किया जा रहा है और सुरक्षा बल इस हिंसा को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं। उन्होंने सुरक्षा संकट की जांच की बात कही थी। वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि हिंसा का शिकार सिर्फ ईसाई नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय भी हो रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय दबाव ने नाइजीरिया की Reputation को और मुश्किल स्थिति में डाल दिया है।


न्याय की मांग और आगे की राह

एमनेस्टी इंटरनेशनल और स्थानीय संगठनों ने इस घटना की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है। लोग चाहते हैं कि दोषियों को सजा मिले, चाहे वे सेना के लोग हों या मिलिशिया के। यह घटना नाइजीरिया के लिए एक चेतावनी है कि देश के भीतर बढ़ते तनाव, गलत प्रशासनिक फैसलों और असंवेदनशील सुरक्षा रणनीतियों को अब सुधारने का समय है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो समाज में अस्थिरता और अविश्वास और गहरा जाएगा। लोगों को उम्मीद है कि इस बार न्याय सिर्फ कागज़ पर नहीं बल्कि जमीन पर दिखेगा

Related Articles

Back to top button

Adblock Detected

Please remove AdBlocker first, and then watch everything easily.