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Pakistan Administrative Division Plan: पाकिस्तान के फिर होंगे टुकड़े-टुकड़े, जिन्ना के मुल्क में तेज हुई बंटवारे की सुगबुगाहट

Pakistan Administrative Division Plan: पाकिस्तान एक बार फिर अपने इतिहास के सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, जहां देश के भीतर ही सीमाओं को फिर से खींचने की तैयारी चल रही है। 1971 में बांग्लादेश के अलग होने का घाव अभी भरा भी नहीं था कि अब वहां की सरकार (Political stability in Pakistan) प्रशासनिक सुधारों के नाम पर मुल्क को कई छोटे हिस्सों में बांटने का मन बना रही है। सरकार का दावा है कि इस कदम से सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा और आम आदमी तक सरकारी सुविधाएं पहुंचेंगी, लेकिन इस योजना ने देश के भीतर एक नए डर और अनिश्चितता को जन्म दे दिया है।

Pakistan Administrative Division Plan
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छोटे प्रांतों का नया सरकारी फॉर्मूला

इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी के अध्यक्ष और संघीय मंत्री अब्दुल अलीम खान ने इस विभाजनकारी योजना का खाका जनता के सामने रखा है। उनके प्रस्ताव के अनुसार, वर्तमान में मौजूद पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे बड़े सूबों को (Demographic shift in provinces) तीन या चार छोटी प्रशासनिक इकाइयों में तोड़ दिया जाएगा। इस तरह पाकिस्तान में प्रांतों की संख्या वर्तमान 4 से बढ़कर 12 या 16 तक पहुंच सकती है। सरकार का तर्क है कि बढ़ती आबादी के बोझ तले दबे बड़े प्रांतों का प्रबंधन करना अब नामुमकिन होता जा रहा है।

गठबंधन सरकार में छिड़ा गृहयुद्ध

नए प्रांतों के इस मुद्दे ने पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के भीतर ही तलवारें खिंचवा दी हैं। एक तरफ जहां MQM-P और IPP जैसी पार्टियां 28वें संविधान संशोधन के जरिए इस योजना को (Constitutional amendment process) जल्द से जल्द अमलीजामा पहनाने के पक्ष में हैं, वहीं बिलावल भुट्टो की पीपीपी इसके कड़े विरोध में उतर आई है। सिंध के मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कह दिया है कि वे अपनी धरती का एक इंच हिस्सा भी बंटने नहीं देंगे। यह टकराव पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर ले आया है जहां आम सहमति बनना लगभग असंभव लग रहा है।

सांस्कृतिक पहचान पर गहराता खतरा

प्रांतों के बंटवारे का विरोध केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम जनता की भावनाओं से भी जुड़ा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के राष्ट्रवादी संगठनों का मानना है कि यह प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि उनकी (Ethnic identity and nationalism) सांस्कृतिक विरासत और भाषाई पहचान को मिटाने की एक गहरी साजिश है। उन्हें डर है कि छोटे टुकड़ों में बंटने के बाद उनकी आवाज केंद्र के सामने और भी कमजोर हो जाएगी, जिससे वे अपनी ही जमीन पर बेगाने हो जाएंगे।

विशेषज्ञों ने दी अराजकता की चेतावनी

प्रशासनिक विशेषज्ञों और पूर्व पुलिस अधिकारियों ने इस योजना को पाकिस्तान की सेहत के लिए आत्मघाती बताया है। सैयद अख्तर अली शाह जैसे जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की असली समस्या (Governance and accountability issues) प्रांतों का आकार नहीं, बल्कि संस्थाओं का खोखलापन और भ्रष्टाचार है। बिना किसी ठोस बुनियादी ढांचे के नए प्रांत बना देने से केवल सरकारी दफ्तरों और अफसरों की फौज खड़ी होगी, जिसका बोझ अंततः जनता की जेब पर ही पड़ेगा। बिना जवाबदेही तय किए नए नक्शे बनाना केवल अराजकता को न्योता देना है।

आर्थिक बदहाली और भारी-भरकम खर्च

पाकिस्तान पहले से ही कर्ज के जाल में फंसा हुआ है और पाई-पाई के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मोहताज है। ऐसे में 12 से 16 नए प्रांत बनाने के लिए (Economic crisis impact) अरबों रुपयों के फंड की व्यवस्था करना नामुमकिन नजर आता है। हर नए प्रांत के लिए अलग विधानसभा, अलग सचिवालय, नया गवर्नर हाउस और पुलिस प्रशासन की जरूरत होगी। आर्थिक जानकारों का कहना है कि जब मुल्क के पास बुनियादी जरूरतों के लिए पैसे नहीं हैं, तो इस तरह के खर्चीले राजनीतिक प्रयोग उसे पूरी तरह दिवालिया बना सकते हैं।

1971 के इतिहास से क्यों डरा है पाकिस्तान

पाकिस्तान का इतिहास विभाजन के कड़वे अनुभवों से भरा हुआ है। 1947 में पांच प्रांतों के साथ शुरू हुए इस देश ने 1971 में अपने एक बड़े हिस्से को (Historical division lessons) बांग्लादेश के रूप में खो दिया था। आज जब बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में अलगाववादी आंदोलन अपनी चरम सीमा पर हैं, तब प्रांतों का बंटवारा आग में घी डालने जैसा साबित हो सकता है। जानकारों को डर है कि कहीं प्रशासनिक सीमाओं का यह फेरबदल एक बार फिर देश को टूटने की कगार पर न ले जाए।

समाधान या सत्ता का खेल

अंततः यह सवाल उठता है कि क्या वाकई यह योजना जनता की भलाई के लिए है या फिर सत्ता की मलाई बांटने का एक नया तरीका। पाकिस्तान की जनता को विकास और (Social welfare schemes) बुनियादी सेवाओं की जरूरत है, न कि नए राजनीतिक नक्शों की। अगर सरकार वाकई सुधार चाहती है, तो उसे मौजूदा सिस्टम में पारदर्शिता और ईमानदारी लानी होगी। सीमाओं को बांटने से ज्यादा जरूरी दिलों को जोड़ना और न्याय व्यवस्था को मजबूत करना है, ताकि भविष्य में 1971 जैसी किसी दूसरी त्रासदी का सामना न करना पड़े।

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