Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने पहाड़िया जनजाति के उत्पीड़न पर जताई नाराजगी, साहिबगंज प्रशासन को सुरक्षा के सख्त निर्देश
Jharkhand High Court: झारखंड के साहिबगंज जिले में आदिम जनजाति पहाड़िया समुदाय के साथ हुए अमानवीय व्यवहार और सामाजिक बहिष्कार के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत ने साहिबगंज जिला प्रशासन को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि पहाड़िया समुदाय के लोगों की सुरक्षा हर हाल में सुनिश्चित की जाए। यह मामला साहिबगंज के कस्बा गांव से जुड़ा है, जहां होली मनाने को लेकर उपजे विवाद के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ रसूखदार लोगों पर पहाड़िया परिवार के सदस्यों को प्रताड़ित करने और उनका हुक्का-पानी बंद करने का गंभीर आरोप लगा है।

होली मनाने पर तालिबानी फरमान और सामाजिक बहिष्कार
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय प्रसाद (Jharkhand High Court) की अदालत में हुई, जहां यह तथ्य सामने आया कि पिछले वर्ष 14 मार्च को जब पहाड़िया समुदाय के लोग होली का पर्व मना रहे थे और संगीत की धुन पर नाच रहे थे, तभी शफीक उल शेख और जलील शेख सहित अन्य आरोपियों ने उन्हें घेर लिया। आरोपियों ने न केवल उन्हें त्योहार मनाने से रोका, बल्कि पूरे गांव में एक ऐसा फरमान जारी कर दिया जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया। पीड़ित पक्ष की ओर से अदालत को बताया गया कि विवाद के बाद आदिम जनजाति के इन लोगों को राशन और दवाओं जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी तरसा दिया गया।
सरकारी संसाधनों पर रोक और बच्चों की पढ़ाई में बाधा
उत्पीड़न की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। आरोपों के मुताबिक, आरोपियों ने पहाड़िया समुदाय के लिए सरकारी जलापूर्ति को जबरन रुकवा दिया और उन्हें सार्वजनिक जल स्रोतों का इस्तेमाल करने से भी वंचित कर दिया। हद तो तब हो गई जब गांव के आंगनवाड़ी केंद्र और सरकारी स्कूलों में जाने वाले पहाड़िया समुदाय के बच्चों को भी डरा-धमका कर शिक्षा से दूर करने की कोशिश की गई। गांव में यह घोषणा कर दी गई कि यदि कोई भी व्यक्ति पहाड़िया समुदाय की मदद करेगा, तो उस पर 10,000 रुपये का भारी जुर्माना लगाया जाएगा। इस सामाजिक घेराबंदी के कारण यह विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) भुखमरी की कगार पर पहुंच गया था।
उच्च न्यायालय ने खारिज की आरोपियों की जमानत याचिका
28 जनवरी को हुई सुनवाई के दौरान झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपियों की दलीलों को सिरे से नकारते हुए उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने टिप्पणी की कि यह मामला केवल आपसी विवाद का नहीं, बल्कि एक संरक्षित जनजाति के मौलिक अधिकारों के हनन का है। हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी उंगली उठाई और जांच में हो रही देरी को लेकर सवाल खड़े किए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि साहिबगंज के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक यह सुनिश्चित करें कि अब पहाड़िया समुदाय के किसी भी सदस्य को भय के साये में न जीना पड़े।
राज्य सरकार और डीजीपी को नोटिस जारी
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि इस जनजाति के कल्याण के लिए भी पर्याप्त कदम उठाए जाएं। अदालत ने जिला प्रशासन की भूमिका पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि पहाड़िया समुदाय के लोगों की अब तक घोर उपेक्षा की गई है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बरहरवा थाने में एससी/एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला पहले ही दर्ज है, और अब अदालत की सख्ती के बाद प्रशासन को सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं की रिपोर्ट पेश करनी होगी।



