India Pakistan Ceasefire 2025: क्या वाकई चीन ने रुकवाई थी भारत-पाकिस्तान की जंग, चारों तरफ फैला कूटनीति का मायाजाल
India Pakistan Ceasefire 2025: मई 2025 का महीना दक्षिण एशिया के इतिहास में एक काले अध्याय की तरह दर्ज हो गया, जब भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था। भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने सीमा पार हलचल मचा दी थी, जिससे पूरे क्षेत्र में (Cross Border Conflict) की स्थिति पैदा हो गई। हालांकि, इस भीषण टकराव के बाद हुए सीजफायर ने राहत तो दी, लेकिन अब इस शांति का श्रेय लेने के लिए दुनिया की महाशक्तियों के बीच एक अजीब सी होड़ मच गई है। अमेरिका के बाद अब चीन ने भी इस कूटनीतिक जीत का सेहरा अपने सिर बांधने की कोशिश शुरू कर दी है।

पाकिस्तान का बदलता सुर और चीन की दावेदारी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ पाकिस्तान का बदला हुआ रवैया है। संघर्ष के तुरंत बाद पाकिस्तान जहां अमेरिकी हस्तक्षेप की दुहाई दे रहा था, वहीं अब उसने बीजिंग के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर (China Mediation Claim) पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसमें चीन ने खुद को भारत और पाकिस्तान के बीच एक सुलहकर्ता के रूप में पेश किया था। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का यह यू-टर्न वैश्विक राजनीति के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि इससे पहले इस्लामाबाद वाशिंगटन की भूमिका को सबसे अहम बता रहा था।
ताहिर अंद्राबी का आधिकारिक बयान और चीनी सक्रियता
पाकिस्तानी विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने हाल ही में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान उन तनावपूर्ण दिनों का कच्चा चिट्ठा खोला। अंद्राबी के मुताबिक, 6 से 10 मई के बीच जब दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं, तब चीनी नेतृत्व लगातार (Diplomatic Communication) के जरिए पाकिस्तान के संपर्क में बना हुआ था। उन्होंने यह भी दावा किया कि चीन ने केवल पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि भारतीय नेतृत्व के साथ भी संवाद स्थापित किया था। पाकिस्तान का मानना है कि बीजिंग की इसी सक्रियता और ‘सकारात्मक कूटनीति’ के कारण ही सरहद पर खूनी संघर्ष को टालना संभव हो पाया।
भारत का कड़ा रुख और मध्यस्थता से साफ इनकार
चीन और पाकिस्तान के इन लुभावने दावों के बीच भारत अपनी पुरानी और स्पष्ट नीति पर अडिग है। नई दिल्ली ने हमेशा की तरह किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप या मध्यस्थता की संभावना को पूरी तरह से नकार दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि (Third Party Intervention) की भारत की नीति में कोई जगह नहीं है और चीन का दावा हकीकत से कोसों दूर है। भारत का मानना है कि यह द्विपक्षीय मामला था और इसे सैन्य स्तर की बातचीत के माध्यम से ही सुलझाया गया था, जिसमें किसी बाहरी देश का कोई योगदान नहीं था।
भारतीय रक्षा मंत्रालय की जमीनी हकीकत
भारतीय रक्षा विशेषज्ञों और मंत्रालय का कहना है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद हुआ युद्ध विराम किसी विदेशी दबाव का नतीजा नहीं था। हकीकत यह थी कि पाकिस्तानी सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO) ने खुद भारतीय समकक्ष से संपर्क साधा था। जमीनी स्तर पर (Military Level Dialogue) के माध्यम से ही गोलीबारी रोकने का अनुरोध किया गया था, जिसे भारत ने मानवता और शांति के हित में स्वीकार किया। भारत ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी के उन दावों को पहले ही खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने खुद को शांतिदूत बताने की कोशिश की थी।
पाकिस्तान की टाइमिंग और कूटनीतिक चाल
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान का यह ताजा बयान उसकी एक गहरी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इतने महीनों की चुप्पी के बाद अचानक चीन को श्रेय देना कई सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, (Geopolitical Strategy) के तहत पाकिस्तान अब खुद को पूरी तरह से चीन के पाले में दिखाना चाहता है। इससे पहले वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफों के पुल बांध रहा था, लेकिन अब अचानक बीजिंग का पक्ष लेना यह दर्शाता है कि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते दबदबे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाना चाहता है।
अमेरिका और चीन के बीच ‘शांति रक्षक’ बनने की होड़
मई 2025 के संकट के बाद अब दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां, अमेरिका और चीन, एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं। जहां राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके दखल के बिना (International Conflict Resolution) संभव नहीं था, वहीं चीन अब पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखकर खुद को एक जिम्मेदार ‘शांति रक्षक’ साबित करने में जुटा है। यह होड़ केवल भारत-पाकिस्तान की शांति के लिए नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाने की एक बड़ी वैश्विक जंग का हिस्सा है।
ऑपरेशन सिंदूर के जख्म और भविष्य की राह
भले ही दावों और प्रति-दावों का दौर जारी हो, लेकिन यह सच है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने पाकिस्तान को गहरे जख्म दिए हैं। हाल ही में हाफिज सईद के करीबियों ने भी स्वीकार किया था कि भारतीय कार्रवाई ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया है। वर्तमान में (Nuclear Installation List) को साझा करना और सीजफायर को बनाए रखना दोनों देशों की मजबूरी और जरूरत दोनों है। भारत के लिए शांति का अर्थ अपनी संप्रभुता से समझौता करना नहीं है, जबकि पाकिस्तान और चीन की जुगलबंदी वैश्विक समुदाय को भ्रमित करने का एक नया प्रयास मात्र नजर आती है।



