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Somnath Temple 1000 Years Completion History: गजनी के आक्रमण के 1000 साल बाद पीएम मोदी ने नेहरू पर किया तीखा वार

Somnath Temple 1000 Years Completion History: भारत की आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनी के क्रूर आक्रमण को इस वर्ष पूरे एक हजार साल हो चुके हैं। सन् 1026 में हुए उस भीषण हमले ने न केवल एक भव्य ढांचे को तोड़ा था, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर भी प्रहार किया था। आज 2026 में, उसी ऐतिहासिक घटना की याद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक विशेष ब्लॉग (Historical perspective) साझा किया है। इस लेख में पीएम मोदी ने मंदिर के विनाश से लेकर उसके भव्य पुनरुद्धार तक की गाथा को शब्दों में पिरोया है, जो भारत की अटूट सांस्कृतिक शक्ति को दर्शाता है।

Somnath Temple 1000 Years Completion History
Somnath Temple 1000 Years Completion History

सरदार पटेल का संकल्प और सोमनाथ का नया उदय

पीएम मोदी ने अपने लेख में स्वतंत्र भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को सर्वोच्च स्थान दिया है। उन्होंने लिखा कि आजादी के तुरंत बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र बीड़ा सरदार पटेल ने ही उठाया था। साल 1947 में दिवाली के दौरान (National leadership) का परिचय देते हुए सरदार साहब ने सोमनाथ की यात्रा की थी। वहां के भग्नावशेषों को देखकर वे भीतर तक हिल गए थे और वहीं उन्होंने संकल्प लिया था कि सोमनाथ का भव्य मंदिर फिर से खड़ा होगा। उनकी यही दृढ़ इच्छाशक्ति थी जिसने 11 मई 1951 को मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोलने का मार्ग प्रशस्त किया।

नेहरू का विरोध और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की अडिगता

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ब्लॉग में इतिहास के उन विवादित पन्नों को भी पलटा है, जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर असहमत थे। मोदी के अनुसार, नेहरू इस आयोजन (Political ideology) को लेकर उत्साहित नहीं थे और वे नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति या कोई मंत्री इस समारोह में शामिल हों। नेहरू का मानना था कि इससे भारत की छवि प्रभावित होगी। लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे। नेहरू के विरोध के बावजूद वे समारोह में शामिल हुए और एक नया इतिहास रच दिया।

केएम मुंशी का योगदान और अमर चेतना का मंत्र

सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार की चर्चा कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (केएम मुंशी) के जिक्र के बिना अधूरी है। पीएम मोदी ने मुंशी जी की पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’ का हवाला देते हुए कहा कि यह पुस्तक हर भारतीय को पढ़नी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सोमनाथ (Cultural resilience) केवल पत्थर और गारे का ढांचा नहीं है, बल्कि यह हमारी अमर चेतना का प्रतीक है। गीता के श्लोक ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हमलावर भौतिक ढांचे को तो नष्ट कर सकते हैं, लेकिन सोमनाथ की आत्मा को कभी नहीं मार सके।

बदलता भारत और दुनिया की बढ़ती उम्मीदें

आज जब भारत अपनी स्वतंत्रता के अमृत काल में आगे बढ़ रहा है, तो सोमनाथ की यह गौरवगाथा हमें संघर्ष से शक्ति की ओर ले जाती है। पीएम मोदी ने लिखा कि इन्हीं संस्कारों की वजह से आज दुनिया भारत को एक नई उम्मीद के साथ देख रही है। वैश्विक समुदाय हमारे (Innovative youth) और हमारी संस्कृति में निवेश करना चाहता है। योग, आयुर्वेद और हमारी कला आज वैश्विक पहचान बन चुकी है। सोमनाथ की मजबूती आज के भारत के संकल्प को दर्शाती है, जो हर चुनौती से टकराकर फिर से उठ खड़ा होना जानता है।

आक्रमणकारी बने धूल और सोमनाथ हुआ प्रकाशमान

प्रधानमंत्री ने भावुक होते हुए लिखा कि 1026 के पहले आक्रमण के एक हजार साल बाद भी सोमनाथ के समुद्र की गर्जना वैसी ही है। समुद्र की लहरें सोमनाथ के बार-बार उठ खड़े होने की गाथा सुनाती हैं। इतिहास गवाह है कि (Historical invader) जो विनाश करने आए थे, वे आज समय की धूल बन चुके हैं और उनका नाम केवल विनाश के प्रतीक के तौर पर फुटनोट बनकर रह गया है। इसके विपरीत, सोमनाथ अपनी पूरी भव्यता के साथ आज भी प्रकाश बिखेर रहा है, जो मानवता को सृजन की शक्ति का संदेश देता है।

आस्था की शक्ति बनाम घृणा की विकृति

ब्लॉग के समापन में पीएम मोदी ने एक बहुत बड़ी बात कही है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। सोमनाथ का इतिहास (Spiritual strength) का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह मंदिर हमें सिखाता है कि सत्य और श्रद्धा को कभी दबाया नहीं जा सकता। एक हजार साल पहले जो घाव महमूद गजनी ने दिए थे, आज सोमनाथ की चमक ने उन घावों को भरकर भारत के स्वाभिमान को पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित कर दिया है।

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