DashaMataVrat – 13 मार्च को मनाया जाएगा दशा माता पर्व, जानिए व्रत कथा और महत्व
DashaMataVrat – हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की दशमी तिथि को दशा माता का पर्व मनाया जाता है। इस दिन देवी की पूजा विशेष विधि-विधान के साथ की जाती है और कई श्रद्धालु व्रत भी रखते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त इस दिन श्रद्धा के साथ व्रत रखकर दशा माता की कथा सुनते या पढ़ते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का संचार होता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 13 मार्च को मनाया जाएगा। देश के कई हिस्सों में महिलाएं इस दिन पूजा के दौरान पवित्र डोरा धारण करती हैं, जिसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

दशा माता व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में नल नाम के एक प्रतापी राजा हुआ करते थे और उनकी पत्नी दमयंती थीं। दोनों मिलकर न्याय और सद्भाव से राज्य चलाते थे। उनके राज्य में सुख-शांति और समृद्धि का वातावरण था। एक दिन महल में एक ब्राह्मणी आई, जिसके गले में पीले रंग का एक पवित्र धागा बंधा हुआ था।
रानी ने जब उस धागे के बारे में पूछा तो ब्राह्मणी ने बताया कि यह दशा माता का डोरा है। उसने कहा कि इसे श्रद्धा के साथ धारण करने से घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है। ब्राह्मणी ने रानी को भी ऐसा ही डोरा दिया। रानी ने पूरे विश्वास के साथ उस डोरे को धारण कर लिया।
जब राजा नल ने रानी के गले में धागा देखा तो उन्होंने इसके बारे में पूछा। रानी ने पूरी बात बताई, लेकिन राजा को यह बात पसंद नहीं आई। उनका मानना था कि जब उनके पास पहले से ही सब कुछ है तो ऐसे धागे की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने रानी से उसे उतारने के लिए कहा, लेकिन रानी ने मना कर दिया। इसके बाद राजा ने स्वयं ही वह डोरा तोड़कर फेंक दिया। रानी को इस बात का बहुत दुख हुआ और उन्होंने कहा कि देवी का अपमान उचित नहीं था।
स्वप्न में मिला संकेत और बदली परिस्थितियां
कथा के अनुसार उसी रात राजा को एक अजीब सपना आया। उन्होंने देखा कि दो स्त्रियां महल में आई हैं। उनमें से एक कह रही थी कि वह यहां से जा रही है और दूसरी कह रही थी कि वह यहां रहने आ रही है। यह सपना राजा को कई दिनों तक लगातार दिखाई देता रहा।
जब रानी ने राजा से इसका कारण पूछा तो उन्होंने पूरा स्वप्न बताया। रानी ने सुझाव दिया कि अगली बार उनसे उनके नाम पूछें। अगले स्वप्न में राजा ने ऐसा ही किया। तब जाने वाली स्त्री ने अपना नाम लक्ष्मी बताया और आने वाली स्त्री ने अपना नाम दरिद्रता बताया। यह सुनकर राजा चिंतित हो गए।
कुछ ही समय बाद राजा के जीवन में कठिनाइयां शुरू हो गईं। उनका सारा वैभव धीरे-धीरे समाप्त होने लगा और परिस्थितियां इतनी बदल गईं कि उन्हें महल छोड़कर जंगल में रहना पड़ा। वे कंद-मूल खाकर जीवन बिताने लगे और कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
कठिनाइयों के बाद फिर बदला भाग्य
कथा के अनुसार समय के साथ राजा और रानी को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। रास्ते में कई बार ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे उनका जीवन और कठिन हो गया। अंततः उन्होंने तय किया कि वे किसी के सहारे रहने के बजाय जंगल में लकड़ी काटकर अपना जीवन चलाएंगे।
एक दिन वे एक सूखे बगीचे में पहुंचे। आश्चर्य की बात यह थी कि उनके वहां पहुंचते ही बगीचा फिर से हरा-भरा हो गया। बाग के मालिक ने यह देखकर उन्हें अपने यहां काम पर रख लिया। उसी स्थान पर एक दिन रानी ने एक महिला को संपदा देवी की कथा सुनते और डोरा धारण करते देखा।
रानी ने भी श्रद्धा के साथ कथा सुनी और पवित्र डोरा धारण किया। उसी रात राजा को फिर स्वप्न आया, लेकिन इस बार दृश्य अलग था। अब आने वाली स्त्री ने अपना नाम लक्ष्मी बताया और जाने वाली ने दरिद्रता। यह संकेत था कि देवी की कृपा से उनका दुर्भाग्य समाप्त हो रहा है।
देवी की कृपा से लौटी समृद्धि
इसके बाद धीरे-धीरे राजा और रानी की परिस्थितियां बदलने लगीं। लोगों को जब यह पता चला कि वे साधारण मजदूर नहीं बल्कि राजा नल और रानी दमयंती हैं, तो सबने उनका सम्मान किया। वे अपने राज्य लौटे और रास्ते में जिन स्थानों पर उन्हें नुकसान हुआ था, वहां सब कुछ पहले जैसा मिल गया।
अंततः जब वे अपने राज्य पहुंचे तो उनका खोया हुआ वैभव वापस मिल गया और राज्य में फिर से सुख-समृद्धि का वातावरण बन गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह सब दशा माता की कृपा और उनके पवित्र डोरे के प्रभाव से संभव हुआ। इसलिए इस दिन श्रद्धा के साथ पूजा और कथा सुनने की परंपरा आज भी निभाई जाती है।



