GaneshPuja – क्यों हर शुभ कार्य में सबसे पहले होती है श्री गणेश की आराधना…
GaneshPuja – सनातन परंपरा में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश के स्मरण से की जाती है। विवाह, गृहप्रवेश, पूजा-पाठ या नया व्यवसाय—हर अवसर पर सबसे पहले ‘विघ्नहर्ता’ का नाम लिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि उनकी कृपा से कार्य बिना बाधा के संपन्न होता है। लेकिन यह परंपरा केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा भी जुड़ी है। शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित प्रसंग बताता है कि गणेश जी को ‘प्रथम पूज्य’ का स्थान कैसे मिला।

देवताओं के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद
प्राचीन कथा के अनुसार एक समय देवताओं के बीच यह प्रश्न उठा कि पृथ्वी पर सबसे पहले किसकी पूजा होनी चाहिए। इंद्र अपनी सत्ता पर गर्व करते थे, कार्तिकेय अपनी वीरता का हवाला देते थे, वहीं अन्य देवता भी अपने-अपने गुणों को श्रेष्ठ बता रहे थे। जब विवाद बढ़ने लगा और कोई निष्कर्ष नहीं निकला, तो सभी देवता भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुंचे। उनसे निवेदन किया गया कि वे इस प्रश्न का समाधान करें।
ब्रह्मांड की परिक्रमा की शर्त
विवाद को शांत करने के लिए भगवान शिव ने एक अनोखी प्रतियोगिता की घोषणा की। उन्होंने कहा कि जो देवता अपने वाहन पर बैठकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर सबसे पहले लौट आएगा, वही प्रथम पूज्य कहलाएगा। यह सुनते ही सभी देवता तेजी से अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर निकल पड़े। इंद्र ऐरावत पर, कार्तिकेय मयूर पर और अन्य देवता भी अपने वाहनों के साथ ब्रह्मांड यात्रा पर निकल गए।
गणेश जी की बुद्धिमत्ता का उदाहरण
गणेश जी का वाहन छोटा सा मूषक था। उनके लिए विशाल ब्रह्मांड की परिक्रमा करना कठिन प्रतीत हो रहा था। लेकिन उन्होंने जल्दबाजी में कदम उठाने के बजाय बुद्धि का सहारा लिया। उन्होंने अपने माता-पिता शिव और पार्वती की सात बार परिक्रमा की और विनम्र भाव से वहीं खड़े हो गए। जब अन्य देवता लंबी यात्रा के बाद लौटे, तो देखा कि गणेश पहले से ही वहां उपस्थित हैं।
माता-पिता को ही माना संपूर्ण जगत
देवताओं के आश्चर्य पर गणेश जी ने सरल शब्दों में उत्तर दिया कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त संसार समाहित है। उनके अनुसार तीनों लोक, नौ ग्रह और समस्त सृष्टि माता-पिता के रूप में ही विद्यमान हैं। इसलिए उनकी परिक्रमा ही ब्रह्मांड की परिक्रमा के समान है। यह तर्क सुनकर सभी देवता नतमस्तक हो गए।
प्रथम पूज्य का वरदान
गणेश की इस बुद्धिमत्ता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि आगे से किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनसे ही होगी। यदि कोई व्यक्ति उनकी पूजा किए बिना कार्य आरंभ करेगा, तो उसे बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। तभी से गणेश जी ‘विघ्नहर्ता’ और ‘प्रथम पूज्य’ के रूप में पूजे जाते हैं।
यह कथा केवल धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि एक संदेश भी देती है—बुद्धि और श्रद्धा से कठिन से कठिन परिस्थिति का समाधान निकाला जा सकता है। आज भी हर मांगलिक अवसर पर ‘ॐ गणेशाय नमः’ का उच्चारण इसी विश्वास के साथ किया जाता है कि जीवन की राह सरल और सफल बने।



