AnimalSacrifice – मंदिरों में पशु बलि पर रोक की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
AnimalSacrifice – मंदिरों में धार्मिक परंपराओं के नाम पर पशुओं की बलि पर रोक लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। गुरुवार को मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा। यह याचिका धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान होने वाली पशु बलि को चुनौती देती है और दावा करती है कि ऐसी प्रथाएं पशुओं के जीवन के अधिकार से जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ हैं। अदालत में इस मुद्दे को लेकर व्यापक बहस की संभावना जताई जा रही है क्योंकि मामला धार्मिक आस्थाओं और पशु अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय को नोटिस भेजते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका में उठाए गए मुद्दे संवेदनशील हैं और इनमें कानून, परंपरा और पशु अधिकारों से जुड़े कई पहलू शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि देश के कई हिस्सों में आज भी धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पशुओं की बलि दी जाती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की प्रथाओं पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सरकार की ओर से पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं। अदालत ने इस दलील को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वर्तमान कानून और नीतियां इस मुद्दे से निपटने के लिए कितनी प्रभावी हैं।
जनहित याचिका के जरिए उठाया गया मुद्दा
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका के रूप में दाखिल किया गया है। अधिवक्ता श्रुति बिष्ट की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि धार्मिक परंपराओं के नाम पर पशुओं की हत्या को रोकने के लिए कानूनी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंदिरों में होने वाली पशु बलि के मामलों में प्रशासन और सरकार की कार्रवाई अक्सर कमजोर या सीमित नजर आती है।
याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले कई फैसलों में यह कह चुका है कि हर जीव को जीवन का अधिकार प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए अदालत ने कई बार कहा है कि यह अधिकार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर याचिका में दलील दी गई है कि पशुओं को भी संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए और अनावश्यक हिंसा से बचाया जाना चाहिए।
कानून में संशोधन की मांग
याचिका में विशेष रूप से प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 की धारा 28 पर सवाल उठाया गया है। इस प्रावधान के अनुसार यदि किसी धर्म की मान्यता के तहत किसी पशु की हत्या की जाती है तो उसे अपराध नहीं माना जाता। याचिकाकर्ता का कहना है कि यही प्रावधान धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पशु बलि को अप्रत्यक्ष रूप से कानूनी संरक्षण देता है।
याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि इस धारा में संशोधन कर धार्मिक कारणों से होने वाली पशु हत्या पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट और कठोर प्रावधान किए जाएं। इसके साथ ही केंद्र और राज्यों को ऐसे मामलों में निगरानी और कार्रवाई के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। याचिका के अनुसार यदि कानून में स्पष्ट बदलाव किए जाएं तो पशु क्रूरता से जुड़े मामलों में बेहतर नियंत्रण संभव हो सकता है।
विभिन्न क्षेत्रों में जारी है पशु बलि की परंपरा
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत सहित कई क्षेत्रों में पशु बलि की परंपरा आज भी जारी है। इसमें हिमालयी इलाकों, पूर्वोत्तर राज्यों, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों का जिक्र किया गया है। इसके अलावा नेपाल और इंडोनेशिया के बाली जैसे क्षेत्रों में भी धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पशु बलि की परंपरा देखी जाती है।
आमतौर पर इन अनुष्ठानों में युवा और स्वस्थ नर पशुओं को चुना जाता है। याचिका में कहा गया है कि इस प्रथा से जुड़ी सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएं समय के साथ कई क्षेत्रों में बनी हुई हैं, जिससे इसे पूरी तरह समाप्त करना चुनौतीपूर्ण बन जाता है।
याचिकाकर्ता का मानना है कि इस मुद्दे पर केवल कानूनी कदम ही नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है। इसके लिए सरकार, सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज को मिलकर काम करने की जरूरत बताई गई है ताकि धार्मिक आस्था और पशु संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।



