BloodDonationPolicy – सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने रक्तदान नियमों का किया बचाव
BloodDonationPolicy – केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों और महिला सेक्स वर्कर्स को संभावित रक्तदाताओं की सूची से बाहर रखने का निर्णय किसी प्रकार के भेदभाव पर आधारित नहीं है। सरकार का कहना है कि यह फैसला स्वास्थ्य संबंधी शोध और वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित है, जिनमें इन समूहों में एचआईवी संक्रमण का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में काफी अधिक पाया गया है। गुरुवार को शीर्ष अदालत में दायर पक्ष में सरकार ने कहा कि रक्तदान से जुड़ी नीतियों का मूल उद्देश्य मरीजों को अधिकतम सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराना है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील रखी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रक्त नीति का आधार यह सुनिश्चित करना है कि रक्त केवल ऐसे दाताओं से लिया जाए जिनमें संक्रमण का जोखिम न्यूनतम हो। उनके अनुसार रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया कई गंभीर मरीजों के लिए जीवन रक्षक होती है, इसलिए इसमें सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
सरकार ने अदालत को बताया कि रक्तदान से जुड़े दिशा-निर्देश व्यापक स्वास्थ्य अध्ययनों और विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर तैयार किए जाते हैं। इसलिए किसी भी समूह को उच्च जोखिम श्रेणी में रखना सामाजिक या व्यक्तिगत पहचान से नहीं, बल्कि चिकित्सा संबंधी जोखिम के आकलन से जुड़ा हुआ निर्णय है।
उच्च जोखिम वाले समूहों पर नीति का आधार
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि राष्ट्रीय रक्त नीति के अनुसार ऐसे समूहों से रक्त लेना उचित नहीं माना जाता जिनमें संक्रमण फैलने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक हो। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय, समलैंगिक पुरुषों और महिला सेक्स वर्कर्स में एचआईवी के साथ-साथ हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी जैसे संक्रमणों का खतरा अधिक पाया गया है।
सरकार का कहना है कि रक्तदान से पहले दाताओं की स्क्रीनिंग का मुख्य उद्देश्य संभावित संक्रमण को रोकना होता है। यदि जोखिम वाले समूहों से रक्त लिया जाता है तो इससे ट्रांसफ्यूजन के जरिए संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ सकती है। इसी कारण नीति में सावधानी बरतते हुए कुछ श्रेणियों को रक्तदान से बाहर रखा गया है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े क्या कहते हैं
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की वर्ष 2020-21 की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र ने अदालत को बताया कि देश की सामान्य वयस्क आबादी की तुलना में कुछ विशिष्ट समूहों में एचआईवी का प्रसार काफी अधिक दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इन समूहों में एचआईवी संक्रमण का जोखिम औसतन 6 से 13 गुना तक अधिक पाया गया है।
सरकार ने कहा कि रक्त से फैलने वाले संक्रमणों को रोकना स्वास्थ्य प्रणाली की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि संक्रमित रक्त किसी मरीज को चढ़ जाता है तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। इसलिए नीति बनाते समय जोखिम के स्तर का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है और उसी आधार पर दिशा-निर्देश तैयार किए जाते हैं।
वैश्विक स्तर पर भी लागू हैं ऐसे नियम
केंद्र ने अदालत को यह भी बताया कि इस प्रकार के प्रतिबंध केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। दुनिया के कई देशों में रक्तदान से जुड़े नियमों में उच्च जोखिम वाले समूहों को लेकर समान प्रकार की सावधानियां बरती जाती हैं। सरकार के अनुसार कई यूरोपीय देशों में यौन रूप से सक्रिय समलैंगिक पुरुषों को रक्तदान करने पर स्थायी या दीर्घकालिक प्रतिबंध लगाया गया है।
हलफनामे में कहा गया है कि विश्व स्तर पर रक्त से फैलने वाले संक्रमणों को रोकने के लिए कई स्वास्थ्य संस्थाएं इसी तरह की नीतियों का पालन करती हैं। इसका उद्देश्य किसी भी सामाजिक वर्ग को निशाना बनाना नहीं बल्कि रक्त आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की दलील
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी कहा कि रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया आमतौर पर तब अपनाई जाती है जब मरीज की स्थिति गंभीर होती है और अन्य विकल्प सीमित होते हैं। ऐसे मामलों में संक्रमण का जोखिम पूरी तरह खत्म करना बेहद जरूरी हो जाता है। इसी वजह से नीति बनाते समय सार्वजनिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि इस विषय को केवल व्यक्तिगत अधिकारों के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। इसे व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और देश की स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समझना होगा। भारत जैसे विशाल और विविध देश में सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराना स्वास्थ्य प्रणाली की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, इसलिए नीति का मुख्य उद्देश्य मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।



