ContemptCase – जज पर आरोप लगाने वाले वकील को सुप्रीम कोर्ट से पड़ी फटकार
ContemptCase – सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ सार्वजनिक मंच से आरोप लगाना और प्रेस कॉन्फ्रेंस करना बेहद गंभीर मामला है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने वकील नीलेश ओझा की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। ओझा ने मुंबई हाई कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ शुरू की गई अवमानना कार्यवाही को चुनौती दी थी, जिसे शीर्ष अदालत ने बरकरार रखा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोप बने विवाद की वजह
मामला उस समय सामने आया जब दिशा सालियान की मौत से जुड़े प्रकरण में सुनवाई से पहले वकील ओझा ने एक प्रेस वार्ता आयोजित की थी। इस दौरान उन्होंने उस न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगाए थे, जिनके समक्ष यह मामला लंबित था। इन टिप्पणियों को हाई कोर्ट ने अपमानजनक और न्यायिक गरिमा के खिलाफ मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया और अवमानना कार्यवाही शुरू की।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने साफ कहा कि इस स्तर पर कार्यवाही पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मामले की सुनवाई तेजी से पूरी करे और तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले। शीर्ष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का अहम हिस्सा है।
न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने पर सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी लंबित मामले को इस तरह सार्वजनिक रूप से पेश करना, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो या उसे सनसनीखेज बनाया जाए, स्वीकार्य नहीं है। अदालत के मुताबिक, ऐसे कदम न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इससे न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ता है।
वकीलों की जिम्मेदारी पर जोर
पीठ ने यह भी कहा कि एक वकील न केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि होता है, बल्कि वह अदालत का अधिकारी भी होता है। ऐसे में उससे अपेक्षा की जाती है कि वह पेशेवर मर्यादा और नैतिक जिम्मेदारियों का पालन करे। न्यायालय ने माना कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए लगाए गए आरोप इस आचरण के अनुरूप नहीं थे।
आचरण को बताया अनुचित और गैर-पेशेवर
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि जिस तरीके से प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई और आरोप लगाए गए, वह प्रथम दृष्टया एक अधिवक्ता के लिए अनुचित है। यह व्यवहार न केवल पेशेवर मानकों से नीचे है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के भी विपरीत है। अदालत ने संकेत दिया कि इस तरह की गतिविधियां न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक हैं।
न्यायिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने पर जोर
इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता बनाए रखना सर्वोपरि है। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने या उसे विवादों में घसीटने की कोशिशों को सख्ती से देखा जाएगा। अब इस मामले में आगे की कार्रवाई मुंबई हाई कोर्ट के स्तर पर जारी रहेगी।