DigitalRupee – गुजरात में राशन वितरण में ई-कूपन की हुई शुरुआत
DigitalRupee – राशन कार्ड धारकों के लिए केंद्र सरकार ने एक नई पहल की शुरुआत की है। गुजरात में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी का पायलट प्रोजेक्ट लागू किया गया है। इस व्यवस्था के अंतर्गत पात्र लाभार्थियों को ‘ई-रुपी’ के रूप में डिजिटल कूपन दिए जाएंगे। ये कूपन सीधे उनके डिजिटल वॉलेट में पहुंचेंगे और उनका उपयोग केवल अधिकृत राशन दुकानों से खाद्यान्न खरीदने के लिए ही किया जा सकेगा।

पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में कदम
सरकार का कहना है कि इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य राशन वितरण को अधिक पारदर्शी और लक्षित बनाना है। अब तक सब्सिडी की राशि नकद या पारंपरिक डिजिटल माध्यमों से दी जाती थी, जिससे कई बार राशि के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आती थीं। डिजिटल करेंसी आधारित कूपन के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि दी गई सहायता केवल अनाज खरीदने में ही खर्च हो।
इस नई प्रणाली से लाभ सीधे लाभार्थी तक पहुंचेगा और बिचौलियों की भूमिका सीमित होगी। अधिकारियों का मानना है कि इससे सरकारी योजनाओं की निगरानी भी बेहतर ढंग से हो सकेगी।
फर्जीवाड़े और लीकेज पर लगाम की उम्मीद
विशेषज्ञों का आकलन है कि डिजिटल फूड करेंसी से फर्जीवाड़ा और लीकेज जैसी समस्याओं पर अंकुश लगाया जा सकता है। कई बार शिकायतें आती रही हैं कि सब्सिडी का पैसा निर्धारित उद्देश्य के बजाय अन्य खर्चों में चला जाता है। डिजिटल ट्रैकिंग के जरिए यह स्पष्ट रहेगा कि राशि कब और कहां उपयोग हुई।
इससे सरकारी व्यय पर नियंत्रण मजबूत होगा और योजनाओं की प्रभावशीलता का आकलन भी आसान होगा। तकनीकी प्रणाली के जरिए वितरण प्रक्रिया अधिक जवाबदेह बनने की उम्मीद है।
डिजिटल अभियान से जुड़ा व्यापक लक्ष्य
यह पहल देश में चल रहे डिजिटल अर्थव्यवस्था अभियान का हिस्सा मानी जा रही है। पहले ही ई-पॉस मशीनों और ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ जैसी योजनाओं के जरिए राशन प्रणाली को तकनीक से जोड़ा जा चुका है। अब डिजिटल करेंसी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जोड़कर सरकार इसे एक और स्तर पर ले जाने की तैयारी में है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में अन्य सामाजिक कल्याण योजनाओं में भी इसी तरह की व्यवस्था अपनाई जा सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में चुनौतियां
हालांकि इस योजना के सामने व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में अब भी कई लोगों के पास स्मार्टफोन या स्थिर इंटरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं है। डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण लाभार्थियों को डिजिटल वॉलेट के उपयोग में कठिनाई आ सकती है।
इसके अलावा साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता से जुड़े मुद्दों पर भी विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है। यदि तकनीकी ढांचा मजबूत नहीं हुआ, तो प्रणाली पर विश्वास बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अन्य राज्यों में विस्तार की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, पुडुचेरी में भी इसी सप्ताह मुफ्त राशन के लिए डिजिटल करेंसी का उपयोग शुरू किया जा रहा है। इसके बाद चंडीगढ़ और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना है। पात्र लाभार्थियों के ई-वॉलेट में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी डिजिटल मुद्रा डाली जाएगी, जिसका उपयोग केवल राशन प्राप्त करने के लिए होगा।
सरकार का लक्ष्य है कि अगले तीन से चार वर्षों में इस व्यवस्था को देशभर में विस्तारित किया जाए।
वैश्विक संदर्भ में भारत की पहल
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई देश कल्याणकारी योजनाओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं। अमेरिका में सप्लीमेंटल न्यूट्रीशन असिस्टेंस प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक बेनिफिट ट्रांसफर कार्ड के जरिए सहायता देता है, जबकि ब्राजील और ब्रिटेन में भी प्रीपेड कार्ड प्रणाली लागू है।
हालांकि डिजिटल करेंसी को सीधे सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जोड़ना एक नया प्रयोग है। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो भारत सामाजिक कल्याण योजनाओं में तकनीक के उपयोग के मामले में अग्रणी उदाहरण बन सकता है।



