Global Diplomacy and Vaccine Maitri: जानें कैसे भारत ने वैक्सीन कूटनीति से जीता दुनिया का दिल…
Global Diplomacy and Vaccine Maitri: भारत की विदेश नीति महज फाइलों और समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवेदनाओं से जुड़ी है। हाल ही में IIT मद्रास के छात्रों को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने उन भावुक क्षणों को याद किया जब भारत ने दुनिया को वैक्सीन पहुंचाई थी। उन्होंने (International Relations) के मानवीय पहलू पर जोर देते हुए कहा कि महामारी के उस दौर में जब विकसित देश अपनी आबादी से आठ गुना ज्यादा स्टॉक जमा कर रहे थे, तब भारत ने छोटे देशों की पुकार सुनी। आज भी जब लैटिन अमेरिका या कैरेबियन देशों के प्रतिनिधि मिलते हैं, तो वे भारत के प्रति आभार व्यक्त करते हुए भावुक हो जाते हैं, क्योंकि यदि भारत खड़ा न होता तो शायद उन्हें वैक्सीन नसीब तक नहीं होती।

वैक्सीन की राजनीति और विकसित देशों का दोहरा चेहरा
कोविड काल में दुनिया ने वैश्विक शक्तियों का वह चेहरा भी देखा जो केवल अपने स्वार्थ तक सीमित था। जयशंकर ने साफ किया कि पश्चिमी देशों ने वैक्सीन का भंडारण तो कर लिया, लेकिन छोटे देशों को (Global Health Crisis) के दौरान दस हजार डोज देने में भी आनाकानी की। इसके विपरीत, भारत ने अपनी 1.4 अरब की आबादी की विशाल जिम्मेदारी संभालते हुए भी एकजुटता का परिचय दिया। विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि घर और विदेश की समस्याओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। यदि हमने दुनिया की मदद की, तो बदले में वैश्विक सप्लाई चेन ने भी भारत की उत्पादन क्षमता को सहारा दिया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि मानवता के लिए परस्पर सहयोग अनिवार्य है।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और भारत की अटूट पड़ोसी नीति
पड़ोसियों के साथ रिश्तों पर चर्चा करते हुए विदेश मंत्री ने बांग्लादेश के वर्तमान हालातों का जिक्र किया। अपनी हालिया ढाका यात्रा का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि वे वहां पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने गए थे। भारत की (Neighbourhood First Policy) इस विचार पर टिकी है कि यदि पड़ोसी देश के मन में सद्भावना है, तो भारत मदद के लिए सदैव तत्पर रहता है। उन्होंने कहा कि भारत के पास हर तरह के पड़ोसी हैं, लेकिन हमारा स्वभाव हमेशा उन लोगों की मदद करना रहा है जो कम से कम हानि नहीं पहुँचाते।
श्रीलंका का आर्थिक संकट और भारत का संकटमोचक अवतार
जब श्रीलंका अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक दौर से गुजर रहा था, तब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रक्रियाएं बहुत धीमी थीं। ऐसे समय में भारत ने (Economic Cooperation) की मिसाल पेश करते हुए श्रीलंका को 4 अरब डॉलर का वित्तीय पैकेज दिया। जयशंकर ने छात्रों को समझाया कि पड़ोसी देश अब यह समझने लगे हैं कि भारत की तरक्की एक ‘उठती लहर’ की तरह है। यदि भारत की अर्थव्यवस्था और कद बढ़ेगा, तो इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा। यही वह संदेश है जो भारत अपने हर पड़ोसी देश तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है।
प्राचीन सभ्यता और आधुनिक राष्ट्र का अद्भुत संगम
भारत दुनिया की उन विरली सभ्यताओं में से एक है जो हजारों साल पुरानी होने के बावजूद आज एक शक्तिशाली आधुनिक राष्ट्र के रूप में जीवित है। विदेश मंत्री ने गर्व के साथ कहा कि हमारी ऐतिहासिक विरासत ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। हम अपनी (Cultural Heritage) और मूल्यों को दुनिया के सामने रखने का कर्तव्य निभा रहे हैं। जयशंकर के अनुसार, भारत का अस्तित्व केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह उन प्राचीन मूल्यों का संवाहक है जो आज की वैश्विक व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने का काम करते हैं।
लोकतंत्र का सार्वभौमिकरण और भारतीय योगदान
अक्सर लोकतंत्र को पश्चिमी विचार माना जाता है, लेकिन डॉ. जयशंकर ने इस धारणा को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि यदि भारत लोकतंत्र को न अपनाता, तो यह विचार दुनिया के केवल कुछ सीमित कोनों तक ही सिमट कर रह जाता। भारत ने लोकतंत्र को सफल बनाकर इसे (Universal Democracy) का दर्जा दिलाया है। आज हम अपनी सोच और मूल्यों को दुनिया के सामने रख रहे हैं, लेकिन यह किसी टकराव के माध्यम से नहीं बल्कि दोस्ताना साझेदारी के माध्यम से हो रहा है। पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंध इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।
वसुधैव कुटुंबकम: केवल शब्द नहीं बल्कि भारत का संस्कार
भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र ‘वसुधैव कुटुंबकम’ है, जिसका अर्थ है पूरी दुनिया एक परिवार है। विदेश मंत्री ने इस शब्द की गहराई समझाते हुए कहा कि हमने कभी भी शेष विश्व को एक खतरे या दुश्मन के रूप में नहीं देखा। भारत की दृष्टि हमेशा से समावेशी रही है, जहां हम (Global Peace) और सहयोग को प्राथमिकता देते हैं। हम दुनिया को एक ऐसी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं जहां हर राष्ट्र सुरक्षित महसूस करे। जयशंकर का संबोधन इस बात का प्रमाण था कि आने वाले समय में भारत न केवल एक आर्थिक शक्ति होगा, बल्कि दुनिया का नैतिक नेतृत्व भी करेगा।


