Indian Army vs Mamata Banerjee Controversy: सेना की ममता बनर्जी को दो टूक, फोर्ट विलियम पर लगा सियासत का दाग तो आगबबूला हुए जनरल…
Indian Army vs Mamata Banerjee Controversy: भारतीय सेना की पूर्वी कमान और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच तनातनी अब एक गंभीर संवैधानिक संकट का रूप लेती नजर आ रही है। भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सीधे राजभवन का दरवाजा खटखटाया है। सेना का मानना है कि फोर्ट विलियम जैसे संवेदनशील कमांड बेस को (Political Allegations in India) के केंद्र में घसीटना न केवल संस्था की छवि को धूमिल करता है, बल्कि सुरक्षा बलों के मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

मुख्यमंत्री के दावों से सेना के खेमे में भारी नाराजगी
तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने हाल ही में एक सनसनीखेज दावा किया था, जिसने रक्षा गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। उन्होंने आरोप लगाया था कि फोर्ट विलियम में तैनात एक उच्च पदस्थ कमांडेंट भारतीय जनता पार्टी के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। इस (Institutional Integrity Defense) को ध्यान में रखते हुए सेना के दो जनरलों ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस से मुलाकात की। सेना का स्पष्ट कहना है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में देश की रक्षक सेना को मोहरा बनाना कतई स्वीकार्य नहीं है।
एसआईआर कवायद और भाजपा से सांठगांठ का आरोप
विवाद की जड़ मुख्यमंत्री का वह बयान है जो उन्होंने 13 जनवरी को राज्य सचिवालय में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया था। ममता बनर्जी ने बिना नाम लिए एक कमांडेंट पर निशाना साधते हुए कहा था कि वह फोर्ट विलियम के भीतर बैठकर भाजपा के लिए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Political Neutrality of Army) के मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं। उन्होंने सख्त लहजे में कहा था कि सेना के अधिकारी को राजनीतिक गतिविधियों से बाज आना चाहिए, जिससे सेना की गरिमा को ठेस पहुंची है।
राजभवन की सक्रियता और दिल्ली तक पहुंची बात
लोक भवन के सूत्रों के मुताबिक, राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने सेना की इस शिकायत को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ लिया है। राज्यपाल ने न केवल सेना के अधिकारियों को मामले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया, बल्कि इस (National Security Concerns) से जुड़े मुद्दे को केंद्र सरकार के समक्ष भी उठाया है। बताया जा रहा है कि राज्यपाल ने रक्षा मंत्रालय को इस पूरे घटनाक्रम की विस्तृत रिपोर्ट भेज दी है ताकि संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
संवैधानिक मर्यादा और राज्यपाल का कड़ा रुख
राज्यपाल बोस ने शुरुआत में इस मामले पर फूंक-फूंक कर कदम रखा था, लेकिन तथ्यों की जांच के बाद उनके तेवर भी कड़े नजर आ रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि यदि मुख्यमंत्री के बयानों से (Constitutional Propriety Violation) का कोई भी साक्ष्य मिलता है, तो वह अनिवार्य रूप से हस्तक्षेप करेंगे। राज्यपाल का मानना है कि सेना जैसे निष्पक्ष संस्थान पर राजनीतिक झुकाव का आरोप लगाना एक गंभीर विषय है, जिसकी गहराई से पड़ताल होनी चाहिए।
पूर्वी कमान ने राज्यपाल को सौंपा विरोध पत्र
फोर्ट विलियम से आए सेना के वरिष्ठ जनरलों ने राज्यपाल को एक औपचारिक पत्र भी सौंपा है, जिसमें मुख्यमंत्री के आरोपों को निराधार और अपमानजनक बताया गया है। बैठक के दौरान (Military Leadership Protocol) का पालन करते हुए अधिकारियों ने राज्यपाल से इस मामले में तत्काल दखल देने का अनुरोध किया। सेना ने अपनी शिकायत में यह भी दर्ज किया है कि इस तरह के बयानों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय सेना की छवि को नुकसान पहुंचता है।
सियासी गलियारों में आरोपों की मची है जबरदस्त धूम
ममता बनर्जी के इन आरोपों ने बंगाल की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है, जहाँ विपक्ष इसे सेना का अपमान बता रहा है। टीएमसी सुप्रीमो की दलील है कि उनके पास विशिष्ट जानकारी है कि (Electoral Process Manipulation) की कोशिशों में कुछ सैन्य अधिकारियों का अप्रत्यक्ष सहयोग लिया जा रहा है। हालांकि, सेना ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया गया दुष्प्रचार करार दिया है।
रक्षा मंत्रालय की दखल और भविष्य की रणनीति
अब सबकी नजरें दिल्ली स्थित रक्षा मंत्रालय पर टिकी हैं, क्योंकि राज्यपाल की रिपोर्ट पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया निर्णायक साबित होगी। भारतीय सेना हमेशा से (Apolitical Organization Structure) का गौरवपूर्ण हिस्सा रही है, ऐसे में ममता बनर्जी के आरोपों की सत्यता की जांच होना बेहद जरूरी है। यदि ये आरोप गलत पाए जाते हैं, तो राज्य और केंद्र के बीच एक बड़ा प्रशासनिक गतिरोध पैदा हो सकता है, जो आने वाले समय में बंगाल की राजनीति को और अधिक गरमा देगा।



