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LiveInLaw – सुप्रीम कोर्ट में लिव-इन और दहेज कानून पर अहम सवाल

LiveInLaw – क्या किसी विवाहित पुरुष के साथ रह रही महिला, जिसे कानूनी तौर पर पत्नी का दर्जा नहीं मिला है, दहेज प्रताड़ना के तहत मामला दर्ज करा सकती है? यह प्रश्न अब देश की सर्वोच्च अदालत के सामने है। मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए से जुड़ा है, जिसमें प्रावधान है कि पत्नी अपने पति या उसके रिश्तेदारों के खिलाफ क्रूरता या दहेज उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकती है। लेकिन जब संबंध वैधानिक विवाह के दायरे में न हो, तो कानून की व्याख्या किस तरह होगी—इसी पर न्यायिक मंथन शुरू हुआ है।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक डॉक्टर द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2000 में विधिवत विवाह किया था। बाद में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने दूसरी महिला के साथ विवाह जैसा संबंध स्थापित किया। दूसरी महिला ने आरोप लगाया कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और जान से मारने की कोशिश की गई। इसके बाद उसने घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायत भी दर्ज कराई।

याचिकाकर्ता का कहना है कि दूसरी महिला के साथ उनका कोई वैध वैवाहिक संबंध नहीं था। उनका तर्क है कि जब विवाह कानूनी रूप से मान्य ही नहीं है, तब दहेज प्रताड़ना की धारा कैसे लागू हो सकती है।

कानूनी पेचीदगी

धारा 498ए की भाषा स्पष्ट रूप से ‘पति’ और ‘पत्नी’ शब्दों का उल्लेख करती है। हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार, किसी व्यक्ति का एक ही समय में दो वैध विवाह नहीं हो सकते। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यदि दूसरा संबंध कानूनन अवैध है, तो क्या उसमें रह रही महिला को पत्नी के समान अधिकार मिल सकते हैं?

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कानून की सीमाएं स्पष्ट हैं और उन्हें लिव-इन संबंधों तक विस्तारित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब पुरुष पहले से विवाहित हो। उन्होंने यह भी बताया कि इस संबंध की वैधता को लेकर पारिवारिक अदालत में मामला लंबित है।

उच्च न्यायालय का रुख

इस प्रकरण में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की उस मांग को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की अपील की थी। उच्च न्यायालय ने माना कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामला विचारणीय है और इसे प्रारंभिक स्तर पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के समक्ष है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार से इस विषय पर स्पष्ट जवाब मांगा है। अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से सहयोग करने को कहा है, ताकि सरकार का दृष्टिकोण सामने आ सके।

मामले की जटिलता को देखते हुए अदालत ने एक वरिष्ठ अधिवक्ता को ‘अमिकस क्यूरी’ नियुक्त किया है। उनका दायित्व होगा कि वे निष्पक्ष रूप से कानून के विभिन्न पहलुओं पर अदालत की सहायता करें।

संभावित प्रभाव

यदि सर्वोच्च न्यायालय यह मानता है कि लिव-इन संबंध में रह रही महिला को धारा 498ए के तहत पत्नी के समान अधिकार मिल सकते हैं, तो यह पारिवारिक कानून की व्याख्या में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई का दायरा विस्तृत हो सकता है।

वहीं, यदि अदालत पारंपरिक कानूनी परिभाषा को ही मान्यता देती है, तो यह स्पष्ट संदेश होगा कि वैधानिक विवाह और लिव-इन संबंधों के अधिकार अलग-अलग हैं।

फिलहाल अदालत ने सभी पक्षों को सुनने का संकेत दिया है। आने वाला फैसला न केवल संबंधित पक्षों के लिए, बल्कि देश में वैवाहिक कानूनों की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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