ParliamentUpdate – राज्यसभा में खरगे और रमेश के बीच हुई तीखी नोकझोंक
ParliamentUpdate – संसद के बजट सत्र के दौरान राज्यसभा में उस समय असहज माहौल बन गया जब कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता, मल्लिकार्जुन खरगे और जयराम रमेश, औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के बीच अलग-अलग रुख अपनाते नजर आए। सदन की कार्यवाही के दौरान दोनों नेताओं के वक्तव्यों में सार्वजनिक असहमति दिखी, जिसने विपक्षी खेमे में हलचल पैदा कर दी। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया जब विपक्ष पहले से ही श्रम कानूनों को लेकर सरकार पर निशाना साध रहा है।

विधेयक पर चर्चा के दौरान उठा विवाद
विधेयक पर अपनी बात रखते हुए जयराम रमेश ने इसे श्रमिक हितों के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां ऐसी बनाई गई हैं कि विपक्षी दलों पर समर्थन देने का दबाव बनता दिख रहा है। उनके इस बयान के कुछ ही देर बाद प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे खड़े हुए और स्पष्ट किया कि विपक्ष इस विधेयक का समर्थन करने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने रमेश की टिप्पणी से असहमति जताते हुए कहा कि पार्टी का रुख साफ है और मजदूरों के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। दोनों नेताओं के अलग-अलग बयान ने सदन में मौजूद सदस्यों को चौंका दिया।
विपक्ष का वॉकआउट और राजनीतिक संकेत
खरगे के वक्तव्य के तुरंत बाद विपक्षी दलों के सदस्यों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। इस कदम को सरकार के खिलाफ एकजुट विरोध के तौर पर देखा गया, लेकिन अंदरूनी मतभेदों की चर्चा भी तेज हो गई। संसदीय जानकारों का मानना है कि इस तरह की सार्वजनिक असहमति विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े कर सकती है। हालांकि पार्टी के भीतर इसे सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा बताया गया।
सरकार का पक्ष और मंत्री का जवाब
सदन में चर्चा का जवाब देते हुए श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक का उद्देश्य किसी नए प्रावधान को जोड़ना नहीं, बल्कि उन तीन पुराने कानूनों को औपचारिक रूप से हटाना है जिन्हें पहले ही नई श्रम संहिता में समाहित किया जा चुका है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार का लक्ष्य प्रक्रियाओं को सरल बनाना और कानूनों को व्यवस्थित करना है, न कि श्रमिक अधिकारों को कम करना।
काम के घंटों और न्यूनतम मजदूरी पर सफाई
काम के घंटे आठ से बढ़ाकर बारह किए जाने के आरोपों पर मंत्री ने कहा कि नई व्यवस्था में सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे काम का प्रावधान है, जो अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के अनुरूप है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यूनतम मजदूरी को अब अनिवार्य बनाया गया है, जबकि पहले इसे लागू करना राज्यों के विवेक पर निर्भर था। सरकार के मुताबिक, यह बदलाव श्रमिकों के हितों को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
संसद में विपक्षी दलों की एकजुटता
दिलचस्प बात यह रही कि संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच अप्रत्याशित सामंजस्य देखने को मिला। केरल में विधानसभा चुनावों को लेकर दोनों दल आमने-सामने हैं, लेकिन संसद के भीतर श्रम कानूनों के मुद्दे पर उन्होंने साझा विरोध दर्ज कराया। वामपंथी सांसदों ने कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन में भाग लिया।
सोनिया गांधी का समर्थन और सियासी संदेश
शून्यकाल के दौरान सीपीआई(एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने देशव्यापी आम हड़ताल के मुद्दे को उठाया। इस अवसर पर कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने उनके प्रस्ताव का समर्थन करते हुए हस्ताक्षर किए। आमतौर पर वह ऐसे उल्लेखों पर हस्ताक्षर नहीं करतीं, इसलिए उनके इस कदम को महत्वपूर्ण माना गया। संसदीय हलकों में इसे विपक्षी दलों के बीच सामरिक सहयोग के संकेत के रूप में देखा गया, जिसने राजनीतिक चर्चा को नया आयाम दे दिया।



