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ReusableLaunchVehicle – कम लागत में अंतरिक्ष उड़ान की दिशा में इसरो का अगला बड़ा कदम

ReusableLaunchVehicle – भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब ऐसे तकनीकी चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां लागत और दक्षता दोनों को समान प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने बताया कि इसरो वर्तमान में दोबारा उपयोग किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान की तकनीक पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यह परियोजना फिलहाल प्रायोगिक स्तर पर है और इसका मूल उद्देश्य अंतरिक्ष अभियानों को अधिक किफायती बनाना है, ताकि देश की वैज्ञानिक और रणनीतिक जरूरतें सीमित संसाधनों में पूरी की जा सकें।

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प्रायोगिक चरण में पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान

पिंपरी चिंचवड स्थित डी वाई पाटिल इंटरनेशनल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के अवसर पर मीडिया से बातचीत में डॉ. नारायणन ने कहा कि यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की दिशा तय करेगी। उन्होंने समझाया कि बार-बार उपयोग होने वाले प्रक्षेपण यान से न केवल लागत में कमी आती है, बल्कि लॉन्च की तैयारी और समय-सीमा भी अधिक प्रभावी बनती है। इसरो इस दिशा में चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहा है, ताकि तकनीकी विश्वसनीयता से कोई समझौता न हो।

निजी कंपनियों से तुलना को लेकर स्पष्ट रुख

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निजी अंतरिक्ष कंपनियों, विशेषकर अमेरिका की स्पेसएक्स जैसी संस्थाओं से तुलना पर पूछे गए सवाल पर इसरो प्रमुख ने संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इसरो इस विकास को किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखता। उनका कहना था कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम पूरी तरह राष्ट्रीय जरूरतों के लिए समर्पित है। एक मजबूत और आत्मनिर्भर अंतरिक्ष कार्यक्रम ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सम्मान का आधार बनता है, न कि केवल प्रतिस्पर्धा।

गगनयान मिशन पर काम तय समय-सीमा में

मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम गगनयान को लेकर डॉ. नारायणन ने दोहराया कि लक्ष्य वर्ष 2027 ही रखा गया है। इसके तहत मानव को अंतरिक्ष में भेजने से पहले तीन मानवरहित मिशन पूरे किए जाएंगे। हालांकि पहले मानवरहित मिशन की तारीखें अभी तय नहीं हुई हैं, लेकिन तैयारियां निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने बताया कि मौजूदा वर्ष और आने वाले वर्ष को संगठन के भीतर ‘गगनयान वर्ष’ के रूप में देखा जा रहा है, जिससे सभी संबंधित टीमें इस मिशन पर केंद्रित रह सकें।

भविष्य के ग्रहीय मिशनों की रूपरेखा

इसरो प्रमुख ने आगे बताया कि चंद्रयान-4 और चंद्रयान-5 को पहले ही स्वीकृति मिल चुकी है और इन्हें 2028 के आसपास लॉन्च करने का लक्ष्य रखा गया है। इन अभियानों से चंद्रमा के वैज्ञानिक अध्ययन को और गहराई मिलेगी। इसके साथ ही शुक्र ग्रह के लिए प्रस्तावित मिशन से जुड़ी गतिविधियां भी तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ रही हैं, जिससे भारत का ग्रह विज्ञान कार्यक्रम और मजबूत होगा।

असफलताओं को अनुभव के रूप में देखने की सोच

पीएसएलवी मिशन से जुड़ी हालिया घटनाओं पर सवाल उठने पर डॉ. नारायणन ने कहा कि इसरो इन्हें असफलता की तरह नहीं देखता। उनके अनुसार, हर तकनीकी चुनौती सीखने का अवसर होती है। विशेषज्ञ समितियां सभी आंकड़ों का विश्लेषण कर रही हैं और प्रणालियों की बेहतर समझ विकसित की जा रही है। विश्लेषण पूरा होने के बाद विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी।

अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक नजर

डॉ. नारायणन ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इसरो का फोकस केवल मिशनों तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष आधारित सेवाओं को आम नागरिक तक पहुंचाने पर भी है। लक्ष्य है कि भारत की हिस्सेदारी वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में मौजूदा दो प्रतिशत से बढ़ाकर आठ प्रतिशत तक पहुंचाई जाए, जिससे नवाचार, रोजगार और तकनीकी विकास को नई गति मिल सके।

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