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SupremeCourt – भाईचारे पर जोर, समुदाय विशेष को निशाना बनाना अस्वीकार्य

SupremeCourt – उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव के संदर्भ में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी भी समुदाय को निशाना बनाना संविधान की भावना के विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी को भी अपमानजनक या विभाजनकारी टिप्पणी करने की छूट नहीं देता। यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ की रिलीज को चुनौती दी गई थी।

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मीम, कार्टून और भाषण पर भी टिप्पणी

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि किसी भी व्यक्ति द्वारा भाषण, मीम, कार्टून, चित्र या अन्य माध्यमों से किसी विशेष समुदाय को बदनाम करना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत सरकारी और गैर सरकारी, दोनों प्रकार के व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता है।

अदालत ने रेखांकित किया कि अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों का उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। यदि किसी प्रस्तुति का प्रभाव किसी समूह की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला हो, तो वह संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप नहीं माना जाएगा।

उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों की जिम्मेदारी

फैसले में विशेष रूप से उन लोगों का उल्लेख किया गया है जो ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। न्यायालय ने कहा कि ऐसे पदों पर आसीन व्यक्तियों ने संविधान की रक्षा और पालन की शपथ ली होती है, इसलिए उनसे अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

धर्म, जाति या भाषा के आधार पर विभाजनकारी बयान देना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की अभिव्यक्तियां न केवल सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करती हैं, बल्कि राष्ट्रीय एकता पर भी प्रतिकूल असर डाल सकती हैं।

फिल्म विवाद और अदालत की प्रक्रिया

यह टिप्पणी उस समय आई जब फिल्म निर्माता नीरज पांडे की ओर से दायर हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया गया। याचिका में फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने 19 फरवरी को सुनवाई के बाद याचिका का निपटारा कर दिया।

पीठ ने उम्मीद जताई कि विवाद अब समाप्त हो जाएगा और मामले को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख

अपने फैसले में न्यायमूर्ति भुइयां ने संविधान की प्रस्तावना का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना भारत के संवैधानिक उद्देश्यों में शामिल है। उन्होंने लिखा कि व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखना हर नागरिक का दायित्व है।

अदालत ने कहा कि जाति, धर्म या भाषा से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करना ही लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है। यह केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है।

संतुलित संदेश

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सार्वजनिक मंचों और डिजिटल माध्यमों पर अभिव्यक्ति के स्वरूप को लेकर बहस जारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता का अधिकार जिम्मेदारी के साथ जुड़ा हुआ है।

फैसला यह संकेत देता है कि लोकतंत्र में असहमति और अभिव्यक्ति की जगह है, लेकिन किसी समुदाय को अपमानित करने या सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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