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SupremeCourt – शादी के झूठे वादे और सहमति पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

SupremeCourt – गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि हर उस मामले को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जहां किसी महिला ने शादी के वादे के आधार पर शारीरिक संबंध बनाए हों। अदालत ने कहा कि यह मान लेना कठिन है कि एक विवाहित महिला को केवल शादी का झूठा आश्वासन देकर यौन संबंध के लिए उकसाया गया होगा। इसी टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने इस आधार पर दर्ज एक दुष्कर्म का मामला रद्द कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ का फैसला

यह फैसला न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने सुनाया। पीठ ने अपने आदेश में दोहराया कि केवल शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाना अपने आप में दुष्कर्म का अपराध नहीं बन जाता। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में हर स्थिति को उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

दुष्कर्म की कानूनी कसौटी पर अदालत की टिप्पणी

अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 का उल्लेख करते हुए कहा कि दुष्कर्म तभी माना जाएगा, जब यह साबित हो कि आरोपी ने शुरू से ही शादी का वादा सिर्फ यौन संबंध बनाने के उद्देश्य से किया था और उसका इरादा कभी उस वादे को पूरा करने का नहीं था। यदि यह तत्व मौजूद नहीं है, तो मात्र संबंध बन जाने से अपराध सिद्ध नहीं होता।

हाईकोर्ट के आदेश को किया निरस्त

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने आरोपी वकील के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मुकदमे को रद्द करने से इनकार कर दिया था। शीर्ष अदालत ने माना कि हाईकोर्ट ने मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया और इसलिए उसका आदेश टिकाऊ नहीं है।

शिकायतकर्ता की वैवाहिक स्थिति पर विशेष जोर

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अपने निर्णय में कहा कि कथित संबंध की पूरी अवधि के दौरान शिकायतकर्ता महिला पहले से विवाहित थी। उनका तलाक का मामला उस समय भी अदालत में लंबित था। पीठ ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष इस तथ्य से भली-भांति अवगत थे कि महिला कानूनी रूप से अभी शादीशुदा है।

शिकायतकर्ता स्वयं वकील होने का भी उल्लेख

अदालत ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि शिकायतकर्ता खुद एक वकील हैं। पीठ ने कहा कि ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि वह कानून की इस स्थापित स्थिति से अनजान होंगी। अदालत के अनुसार, दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे और महिला की वैवाहिक स्थिति को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं था।

मामला रद्द करने का आधार

सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें शादी के झूठे वादे के जरिए सहमति प्राप्त की गई हो। इसी आधार पर आरोपी वकील के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म का मुकदमा रद्द कर दिया गया।

क्या था पूरा मामला

मामले में शिकायतकर्ता 33 वर्षीय महिला हैं, जो पेशे से वकील हैं और एक बच्चे की मां भी हैं। उन्होंने पुलिस को बताया था कि सितंबर 2022 में आरोपी के साथ उनके शारीरिक संबंध बने। महिला का दावा था कि यह रिश्ता जनवरी 2025 तक चला। इस दौरान वह गर्भवती हुईं और बाद में उन्हें गर्भपात कराना पड़ा।

एफआईआर दर्ज होने की पृष्ठभूमि

शिकायत के अनुसार, जब इस संबंध को लेकर परिवार के भीतर विवाद बढ़ा और हालात हिंसक हो गए, तब फरवरी 2025 में आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन तथ्यों के आधार पर इसे दुष्कर्म का मामला मानने से इनकार कर दिया।

कानूनी मामलों में सहमति की व्याख्या पर असर

इस फैसले को सहमति और शादी के वादे से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि कानून का इस्तेमाल हर व्यक्तिगत संबंध को अपराध की श्रेणी में लाने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें स्पष्ट आपराधिक मंशा सिद्ध न हो।

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