USTariffRuling – सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ आदेशों को किया रद्द
USTariffRuling – अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक टैरिफ आदेशों के बड़े हिस्से को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। छह बनाम तीन के बहुमत से दिए गए इस फैसले में मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने स्पष्ट किया कि 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत राष्ट्रपति को सीधे तौर पर टैरिफ लागू करने का अधिकार नहीं है।

यह निर्णय ट्रंप प्रशासन की उस व्यापार नीति के लिए झटका माना जा रहा है, जिसके तहत आपातकालीन शक्तियों का उपयोग कर कई देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए गए थे। इनमें भारत भी शामिल था, जिस पर अप्रैल 2025 में घोषित 26 प्रतिशत का शुल्क बाद में 25 प्रतिशत किया गया था। अदालत के फैसले के बाद इस प्रकार लगाए गए आपातकालीन टैरिफ की कानूनी वैधता समाप्त हो गई है।
किन टैरिफ पर पड़ा असर
अदालत ने साफ किया कि आपातकालीन आर्थिक शक्तियों का दायरा सीमित है और इन्हें सामान्य व्यापारिक असंतुलन दूर करने के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ट्रंप प्रशासन ने व्यापार घाटे और मादक पदार्थों से जुड़े मुद्दों का हवाला देते हुए इन प्रावधानों का सहारा लिया था।
हालांकि, स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए शुल्क इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे, क्योंकि वे अलग कानूनी प्रावधानों के तहत लागू किए गए थे। इसका मतलब है कि कुछ सेक्टरों में शुल्क व्यवस्था यथावत रहेगी।
भारत के लिए संभावित राहत
भारत के निर्यातकों के लिए यह फैसला सकारात्मक संकेत लेकर आया है। रेसिप्रोकल टैरिफ हटने से टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों पर अतिरिक्त शुल्क का दबाव कम होगा। अमेरिका भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, इसलिए शुल्क में कमी से निर्यात प्रतिस्पर्धा बेहतर हो सकती है।
फरवरी 2026 में हुए द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत रूसी तेल से जुड़े 25 प्रतिशत पेनल्टी टैरिफ पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। अब अदालत के निर्णय से आपातकालीन आधार पर लगाए गए शेष शुल्क भी प्रभावहीन हो गए हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी भारतीय उत्पादों पर शून्य शुल्क लागू हो जाएगा।
आगे की कानूनी और व्यापारिक स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन या भविष्य की सरकारें अन्य प्रावधानों, जैसे सेक्शन 232 या सेक्शन 301, के तहत वैकल्पिक कदम तलाश सकती हैं। इन प्रक्रियाओं में कांग्रेस की भूमिका अधिक होती है और कानूनी जांच भी अपेक्षाकृत सख्त होती है।
भारतीय कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे पहले अदा किए गए अतिरिक्त टैरिफ की वापसी के लिए दावा कर सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो कई उद्योगों को वित्तीय राहत मिल सकती है।
वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव
यह फैसला केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कार्यपालिका की शक्तियों पर न्यायिक संतुलन के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। इससे वैश्विक व्यापार भागीदारों को संकेत मिला है कि एकतरफा शुल्क निर्णयों पर कानूनी रोक संभव है।
भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं को भी इससे नई दिशा मिल सकती है। शुल्क ढांचे में स्पष्टता आने से दीर्घकालिक समझौतों पर बातचीत आसान हो सकती है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय अमेरिकी व्यापार नीति की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। भारतीय निर्यातकों के लिए यह अवसर है कि वे स्थिर और अपेक्षाकृत कम शुल्क वाले वातावरण में अपने व्यापार का विस्तार करें, भले ही सभी क्षेत्रों में पूर्ण छूट अभी संभव न हो।



