Bijnor Medical College Imposter Case: सफेद कोट के पीछे छिपी खौफनाक साजिश, सरकारी अस्पताल में मौत बांट रहा था फर्जी डॉक्टर…
Bijnor Medical College Imposter Case: उत्तर प्रदेश के बिजनौर से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने चिकित्सा जगत और आम जनता के भरोसे को झकझोर कर रख दिया है। शुक्रवार की सुबह बिजनौर मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल में उस समय हड़कंप मच गया, जब एक कथित फर्जी डॉक्टर को मरीजों की जान से खिलवाड़ करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। स्वास्थ्य सेवाओं की (Patient Safety Standards) को ताक पर रखकर यह शख्स बेखौफ होकर गंभीर बीमारियों की दवाइयां लिख रहा था। अस्पताल के भीतर इस तरह की सुरक्षा चूक ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कक्ष संख्या 25 का वो रहस्यमयी डॉक्टर
पूरा मामला अस्पताल के ओपीडी कक्ष संख्या 25 से जुड़ा है, जहां टीबी एवं छाती रोग विशेषज्ञ सहायक आचार्य डॉ. तुषार सिंह बैठते हैं। काफी समय से फार्मेसी विभाग को ऐसे पर्चे मिल रहे थे, जिन पर डॉ. तुषार की मोहर तो थी, लेकिन लिखी गई दवाइयां और तरीका संदेहास्पद था। नियमित जांच के दौरान जब (Hospital Pharmacy Records) का मिलान किया गया, तो पता चला कि दो-दो महीने पुराने मरीजों को भी बिना किसी बदलाव के भारी-भरकम दवाइयां लिखी जा रही थीं। इसी शक ने एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा कर दिया।
मुखौटे के पीछे का सच और फार्मेसी स्टाफ की सतर्कता
शुक्रवार सुबह करीब साढ़े नौ बजे जब चीफ फार्मासिस्ट राजेश रवि को डॉ. तुषार की मोहर लगे संदिग्ध पर्चे मिले, तो उन्होंने खुद सच्चाई जानने का फैसला किया। जब टीम कक्ष संख्या 25 में पहुंची, तो वहां का नजारा हैरान करने वाला था। कमरे में डॉ. तुषार या कोई अन्य जूनियर रेजिडेंट मौजूद नहीं था, बल्कि चेहरे पर मास्क लगाए एक अनजान व्यक्ति धड़ल्ले से मरीजों को दवाइयां पर्चे पर लिखकर दे रहा था। यह (Medical Identity Theft) का एक क्लासिक मामला लग रहा था, जहां कोई बाहरी व्यक्ति डॉक्टर की कुर्सी पर कब्जा जमाए बैठा था।
जब रक्षक ही बना भक्षक: डॉ. तुषार का अजीबोगरीब दावा
हंगामा बढ़ते देख जब अस्पताल के अन्य चिकित्सक वहां पहुंचे, तो उन्होंने तुरंत डॉ. तुषार सिंह को फोन लगाया। चौंकाने वाली बात यह थी कि डॉक्टर ने फोन पर उस अज्ञात व्यक्ति को अपना ‘असिस्टेंट’ बताया और उसे बीएएमएस डॉक्टर करार दिया। डॉ. तुषार ने उसका नाम दिनेश बताया और कहा कि वह जल्द ही अस्पताल पहुंच रहे हैं। किसी भी सरकारी अस्पताल में (Clinical Practice Regulations) के तहत कोई भी डॉक्टर अपना निजी असिस्टेंट रखकर उससे मरीजों को दवाइयां नहीं लिखवा सकता, जो कि इस मामले में साफ तौर पर नियमों का उल्लंघन था।
भीड़ का फायदा उठाकर फरार हुआ कथित फर्जी डॉक्टर
जैसे ही अस्पताल में विरोध के स्वर तेज हुए और स्टाफ ने कड़े सवाल पूछना शुरू किए, कथित फर्जी डॉक्टर दिनेश वहां से मौका पाकर खिसक गया। इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह व्यक्ति संदिग्ध अवस्था में मरीजों के पर्चे भरता दिख रहा है। हालांकि, अस्पताल प्रशासन अभी भी (Evidence Collection in Healthcare) की प्रक्रिया में जुटा है और वायरल वीडियो की सत्यता की जांच की जा रही है। आरोपी का इस तरह भाग जाना उसके फर्जी होने के दावों को और पुख्ता करता है।
टीबी और छाती रोग के मरीजों पर मंडराता मौत का खतरा
यह लापरवाही साधारण नहीं है, क्योंकि कक्ष संख्या 25 में टीबी और छाती से संबंधित गंभीर रोगों के मरीज आते हैं। टीबी जैसी बीमारियों में दवाओं का गलत डोज या गलत दवा मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। स्टाफ का कहना है कि यह (Life Threatening Medical Negligence) काफी दिनों से चल रही थी। बिना किसी विशेषज्ञता के गंभीर रोगों की दवाइयां लिखना न केवल अनैतिक है बल्कि एक आपराधिक कृत्य भी है, जिसकी कीमत गरीब मरीजों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ सकती थी।
जांच के नाम पर पल्ला झाड़ते जिम्मेदार अधिकारी
मामला सामने आने के बाद डॉ. तुषार सिंह ने अपने पिछले बयान से पलटते हुए कहा कि उन्हें लगा था कि कोई जूनियर रेजिडेंट देख रहा होगा और वह उस भागने वाले व्यक्ति को नहीं जानते। वहीं, जिला अस्पताल बिजनौर के सीएमएस डॉ. बीआर त्यागी ने कहा कि उन्हें अभी तक कोई लिखित शिकायत नहीं मिली है। प्रशासन अब एक (Internal Inquiry Committee) गठित करने की बात कह रहा है जो पूरे प्रकरण की जांच करेगी। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी अस्पतालों में कोई भी बाहरी व्यक्ति डॉक्टर की मोहर चुराकर मरीजों का इलाज कर सकता है?
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते कड़वे सवाल
बिजनौर की इस घटना ने पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। क्या अस्पताल में लगे सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षाकर्मी केवल शोपीस हैं? एक अनजान व्यक्ति घंटों तक डॉक्टर की कुर्सी पर बैठकर मरीजों को दवाइयां लिखता रहा और प्रशासन को भनक तक नहीं लगी। इस तरह के (Government Hospital Management) के अभाव में आम आदमी का भरोसा सरकारी इलाज से उठना तय है। अब देखना यह होगा कि जांच कमेटी दोषी डॉक्टर और उस फर्जी असिस्टेंट के खिलाफ क्या सख्त कार्रवाई करती है।



