उत्तर प्रदेश

NaxalFreeBihar – पुलिस का दावा, राज्य में खत्म हुआ नक्सली प्रभाव

NaxalFreeBihar – बिहार पुलिस मुख्यालय ने दावा किया है कि राज्य अब पूरी तरह नक्सल प्रभाव से मुक्त हो चुका है। एक समय था जब बिहार के लगभग एक तिहाई हिस्से में उग्रवादियों का प्रभाव था और कई इलाकों में उनकी समानांतर व्यवस्था चलती थी। जहानाबाद, गया, औरंगाबाद, जमुई, रोहतास और लखीसराय जैसे जिलों में हालात ऐसे थे कि सूर्यास्त के बाद आम नागरिकों के साथ पुलिसकर्मी भी निकलने से कतराते थे। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कभी 22 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

bihar declared naxal free police claim

सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं का असर

पुलिस और केंद्रीय बलों की संयुक्त कार्रवाई, लगातार छापेमारी और सरकार की विकास योजनाओं को इस बदलाव की मुख्य वजह बताया जा रहा है। राज्य सरकार ने 2007 में ‘सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम शुरू कर प्रशासन को दूरदराज क्षेत्रों तक पहुंचाने की कोशिश की थी। अधिकारियों का कहना है कि विकास और भरोसे की इस पहल से लोगों का समर्थन बढ़ा और उग्रवाद कमजोर पड़ा। वर्ष 2025 से अब तक किसी भी नक्सली हिंसा की घटना दर्ज नहीं होने का दावा किया गया है।

भोजपुर से शुरू हुई थी विचारधारा

नक्सल आंदोलन की जड़ें 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से जुड़ी हैं। बिहार में इसकी शुरुआत भोजपुर क्षेत्र से हुई, जहां भाकपा माले के नेतृत्व में आंदोलन खड़ा हुआ। बाद में इस संगठन ने संसदीय राजनीति का रास्ता अपनाया। 1980 और 1990 के दशक में पार्टी यूनिटी और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर जैसे संगठनों ने जहानाबाद, गया और औरंगाबाद सहित कई जिलों में सक्रियता बढ़ाई।

विलय के बाद बढ़ी थी ताकत

1998 में आंध्र प्रदेश की पीपुल्स वार ग्रुप और बिहार की पार्टी यूनिटी के विलय से उग्रवादियों की शक्ति में इजाफा हुआ। 2004 में पीपुल्स वार और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के एकीकरण के बाद भाकपा (माओवादी) का गठन हुआ, जिसने कई वर्षों तक राज्य में प्रभाव बनाए रखा। हालांकि समय के साथ बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और मुठभेड़ों में मौत के बाद संगठन कमजोर होता गया।

प्रभावित जिलों की संख्या में गिरावट

पुलिस सूत्रों के अनुसार 2013 में 22 जिले नक्सल प्रभावित थे। 2019 तक यह संख्या घटकर 16 रह गई और 2024 में केवल आठ जिलों तक सीमित रह गई। उत्तर बिहार को 2024 में पूरी तरह नक्सल मुक्त घोषित किया गया। हथियारबंद दस्तों की संख्या भी तेजी से घटी है। वर्ष 2020 में जहां करीब 190 सक्रिय सदस्य थे, वहीं दिसंबर 2024 तक यह संख्या घटकर 16 रह गई। दिसंबर 2025 तक तीन छोटे सशस्त्र समूहों के सक्रिय होने की सूचना थी, जिनमें से प्रमुख सदस्य सुरेश कोड़ा ने हाल ही में आत्मसमर्पण कर दिया।

बड़े घटनाक्रम जिन्होंने हिलाया था राज्य

राज्य ने अतीत में कई बड़ी घटनाएं देखीं। 2005 में जहानाबाद जेल पर हमला कर सैकड़ों कैदियों को छुड़ा लिया गया था। उसी वर्ष मधुबन में सरकारी संस्थानों और बैंकों पर हमला हुआ। 1992 में गया के बारा और 1999 में सेनारी में सामूहिक हत्याएं हुई थीं। इन घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे और लंबे समय तक भय का माहौल बना रहा।

आत्मसमर्पण और पुनर्वास योजना

पुलिस के अनुसार हाल में आत्मसमर्पण करने वाले सुरेश कोड़ा को पुनर्वास योजना के तहत लाभ दिया जाएगा। घोषित इनाम की राशि के साथ अतिरिक्त प्रोत्साहन और प्रशिक्षण भत्ता भी मिलेगा। आत्मसमर्पण के दौरान उसने कई आधुनिक हथियार पुलिस को सौंपे, जिनमें असॉल्ट राइफल और बड़ी संख्या में कारतूस शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम शेष उग्रवादियों के लिए भी सकारात्मक संदेश है।

पुलिस अधिकारियों ने इसे राज्य के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है, हालांकि वे सतर्कता बनाए रखने पर भी जोर दे रहे हैं ताकि दोबारा ऐसी स्थिति न पैदा हो।

Related Articles

Back to top button

Adblock Detected

Please remove AdBlocker first, and then watch everything easily.