उत्तर प्रदेश

PoliceCustody – आजमगढ़ कस्टडी मौत मामले में पूर्व थानेदार को आजीवन कारावास

PoliceCustody – पुलिस हिरासत में हुई मौत से जुड़े दो दशक पुराने मामले में आजमगढ़ की अदालत ने अहम और सख्त फैसला सुनाया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश जय प्रकाश पांडेय की अदालत ने रानी की सराय थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष रहे जेके सिंह को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उन पर एक लाख पांच हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। यह फैसला 29 मार्च 2003 को थाने के भीतर हुई गोलीबारी की घटना से जुड़ा है, जिसमें बैटरी चोरी के आरोपी हरिलाल यादव की मौत हो गई थी। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आरोपी पुलिस अधिकारी की भूमिका केवल लापरवाही तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने अपने अधीनस्थ को उकसाया, जिसके कारण यह घटना हुई।

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हिरासत में क्या हुआ था

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, मेंहनगर थाना क्षेत्र के दौलतपुर गांव निवासी हरिलाल यादव को ट्रक की बैटरी चोरी के आरोप में रानी की सराय पुलिस ने हिरासत में लिया था। उसी रात उनके बेटे जितेंद्र यादव अपने रिश्तेदार रामबचन यादव के साथ थाने में खाना देने पहुंचे थे। दोनों संतरी को भोजन देकर परिसर में इंतजार कर रहे थे, तभी अंदर से गोली चलने की आवाज सुनाई दी। जितेंद्र जब भीतर भागा तो उसने अपने पिता को खून से लथपथ पाया। शोर मचाने पर पुलिस ने उसे और उसके रिश्तेदार को हवालात में बंद कर दिया। बाद में गंभीर हालत में अस्पताल ले जाने पर हरिलाल की मौत हो गई।

मुकदमा और प्रारंभिक कार्रवाई

अगले दिन 30 मार्च 2003 को जितेंद्र यादव की तहरीर पर तत्कालीन थानाध्यक्ष जेके सिंह और सब इंस्पेक्टर नरेंद्र बहादुर सिंह के खिलाफ धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। घटना के बाद इलाके में भारी आक्रोश फैल गया और ग्रामीणों ने थाने का घेराव किया। हालात को देखते हुए पुलिस को रात में ही जितेंद्र और रामबचन को रिहा करना पड़ा। जिला प्रशासन ने तनाव को देखते हुए पोस्टमार्टम के दौरान भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे।

जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई

परिवार ने स्थानीय पुलिस जांच पर भरोसा न करते हुए शासन से स्वतंत्र जांच की मांग की। इसके बाद सितंबर 2003 में मामला सीबीसीआईडी को सौंप दिया गया। लंबी जांच के बाद फरवरी 2005 में सीबीसीआईडी ने अदालत में चार्जशीट दाखिल की। सुनवाई के दौरान सह-आरोपी दरोगा नरेंद्र बहादुर सिंह की 2017 में मृत्यु हो गई, जिसके कारण उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई।

अदालत में गवाही और मोड़

मामले में कुल सात गवाह थे, लेकिन सुनवाई के दौरान जितेंद्र यादव समेत चार गवाह अपने पहले के बयानों से पलट गए। अदालत ने इसे गंभीर मानते हुए गवाही से मुकरने वाले चारों लोगों के खिलाफ अलग से प्रकीर्ण दर्ज करने की संस्तुति की है। इसके बावजूद उपलब्ध साक्ष्यों, परिस्थितिजन्य गवाहियों और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने जेके सिंह को दोषी ठहराया।

धाराओं में बदलाव का विवाद

मामले की शुरुआत में रानी की सराय थाने में हत्या की धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी, लेकिन बाद में पुलिस ने शहर कोतवाली में दर्ज मुकदमे को इसी केस में मर्ज कर दिया। आरोप है कि चार्जशीट दाखिल करते समय दरोगा नरेंद्र बहादुर सिंह को बचाने के लिए हत्या की धारा हटाकर गैर-इरादतन हत्या (304-ए) लगा दी गई थी। अदालत ने इस पहलू को भी संज्ञान में लिया और कहा कि जांच में कई स्तरों पर खामियां दिखीं।

आरोपी की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

जेके सिंह मूल रूप से वाराणसी के चौबेपुर स्थित छितौनी गांव के रहने वाले हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने आजमगढ़ में मकान बना लिया था, हालांकि वे अपने पैतृक गांव कम ही जाते रहे हैं। उनके परिवार के अन्य सदस्य भी पुलिस सेवा से जुड़े रहे हैं। अदालत के फैसले के बाद उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया है।

यह फैसला पुलिस कस्टडी में मानवाधिकारों के उल्लंघन और जवाबदेही के सवालों को फिर से रेखांकित करता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों की जांच और सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।

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