Paddy Cultivation Ban 2026: ऊधमसिंह नगर में समर धान पर लगा कंप्लीट बैन, हजारों किसानों की आय दांव पर…
Paddy Cultivation Ban 2026: उत्तराखंड के सबसे उपजाऊ मैदानी जिले ऊधमसिंह नगर से एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। जिला प्रशासन ने गिरते भूजल स्तर को देखते हुए इस साल गर्मी के मौसम में होने वाली धान की खेती पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। जिलाधिकारी द्वारा जारी किए गए (Groundwater Conservation Measures) आदेश के अनुसार, 1 फरवरी से लेकर 30 अप्रैल तक जिले के किसी भी हिस्से में धान की बुआई, नर्सरी तैयार करने या रोपाई करने की अनुमति नहीं होगी। यह पहली बार है जब तराई के इस समृद्ध क्षेत्र में जल सुरक्षा को लेकर इतना सख्त और कड़ा रुख अपनाया गया है, जिससे पूरे कृषि क्षेत्र में हलचल मच गई है।

15 हजार किसानों की आजीविका पर संकट के बादल
इस कड़े फैसले का सीधा असर जिले के उन हजारों किसानों पर पड़ने वाला है जो साल में तीन फसलें लेकर अपनी आजीविका चलाते हैं। जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया के अनुसार, इस प्रतिबंध से लगभग 15 हजार किसान (Impact on Farmer Income) सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस रोक के कारण लगभग 150 करोड़ रुपये की धान की उपज प्रभावित हो सकती है। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि इस बार किसी भी दबाव में आकर कोई रियायत नहीं दी जाएगी। आने वाले समय में इसी तरह की पाबंदियां नैनीताल और हरिद्वार के मैदानी इलाकों में भी लागू की जा सकती हैं।
हरियाणा और पंजाब की तर्ज पर सख्त हुआ प्रशासन
उत्तराखंड का यह निर्णय पड़ोसी राज्यों हरियाणा और पंजाब के जल संरक्षण कानूनों से प्रेरित नजर आता है। गौरतलब है कि हरियाणा में समय से पहले धान लगाने पर (Strict Agricultural Regulations) कानूनी रोक है, जबकि पंजाब में कैलेंडर आधारित सिंचाई प्रबंधन किया जाता है। ऊधमसिंह नगर में पिछले साल भी ऐसी कोशिश की गई थी, लेकिन किसानों के विरोध के बाद इसे आंशिक रूप से हटा लिया गया था। हालांकि, इस बार प्रशासन ने कमर कस ली है और इसे अंतिम निर्णय बताया है। राज्य के अन्य जिलों में फिलहाल इस तरह की कोई आधिकारिक रोक लागू नहीं है।
22 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में नहीं लहलहाएगी धान की फसल
प्रशासनिक आंकड़ों की मानें तो ऊधमसिंह नगर जिले में हर साल लगभग 22 हजार हेक्टेयर भूमि पर गर्मी के मौसम में धान उगाया जाता है। यहां के अधिकांश किसान (Small Scale Farming Challenges) एक से दो हेक्टेयर की छोटी जोत वाले हैं, जिनके लिए धान की फसल नकदी का मुख्य स्रोत होती है। अचानक लगे इस प्रतिबंध से इन छोटे किसानों के सामने वित्तीय संकट खड़ा हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि धान की फसल में पानी की खपत सबसे अधिक होती है, जो गर्मी के महीनों में भूजल पर अत्यधिक दबाव डालती है।
70 फीट तक नीचे गिरा जिले का भूजल स्तर
विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों ने इस फैसले का समर्थन करते हुए इसे भविष्य के लिए अनिवार्य बताया है। पिछले एक दशक के भीतर जिले का (Depleting Water Table Statistics) जल स्तर करीब 70 फीट तक नीचे जा चुका है, जो बेहद चिंताजनक है। विशेष रूप से जसपुर और काशीपुर जैसे विकासखंडों की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि उन्हें ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में डाल दिया गया है। तराई क्षेत्र में जिस तरह से भूजल का अंधाधुंध दोहन हुआ है, उसके लिए ग्रीष्मकालीन धान की खेती को ही प्रमुख कारण माना जा रहा है।
जसपुर और काशीपुर में हालात हुए ‘क्रिटिकल’
भूजल विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, जसपुर और काशीपुर जैसे क्षेत्रों में ट्यूबवेल की गहराई लगातार बढ़ती जा रही है, फिर भी पानी की उपलब्धता कम हो रही है। इस (Critical Water Zones) श्रेणी में आने के बाद अब प्रशासन के पास सख्त कदम उठाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। यदि अभी इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले सालों में इन क्षेत्रों में पीने के पानी का भी संकट पैदा हो सकता है। प्रशासन अब किसानों को धान के बजाय कम पानी लेने वाली वैकल्पिक फसलों जैसे दलहन और तिलहन की ओर प्रोत्साहित करने की योजना बना रहा है।
दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए सामूहिक सहयोग की अपील
जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया ने स्पष्ट किया है कि यह कठोर निर्णय कृषि वैज्ञानिकों और विभिन्न किसान संगठनों के साथ लंबी चर्चा के बाद ही लिया गया है। उन्होंने कहा कि (Long Term Water Security) सुनिश्चित करना वर्तमान सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। जिलाधिकारी ने किसानों से अपील की है कि वे आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इस फैसले में प्रशासन का सहयोग करें। प्रशासन का मानना है कि यदि आज यह कदम नहीं उठाया गया, तो ऊधमसिंह नगर की धरती बंजर होने की कगार पर पहुंच जाएगी।
किसानों के लिए वैकल्पिक खेती का नया रोडमैप
धान पर प्रतिबंध लगने के बाद अब कृषि विभाग किसानों के लिए नया कल्टिवेशन प्लान तैयार कर रहा है। किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे (Crop Diversification Strategy) अपनाएं और धान की जगह मक्का, मूंग या सब्जियों की खेती करें। इन फसलों में पानी की खपत धान के मुकाबले काफी कम होती है और बाजार में इनकी अच्छी मांग भी है। सरकार इन वैकल्पिक फसलों के बीजों पर सब्सिडी देने पर भी विचार कर रही है ताकि किसानों को होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई कुछ हद तक की जा सके।



