Uttarakhand: क्या धामी सरकार का मास्टरस्ट्रोक कानून अधर में लटका, जानें राजभवन से विधेयक लौटने की पूरी कहानी
Uttarakhand: उत्तराखंड में जबरन धर्मांतरण के खिलाफ लाए गए बेहद कड़े कानून को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार द्वारा विधानसभा से पारित कराए गए धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक 2025 को राजभवन से फिलहाल मंजूरी नहीं मिल सकी है। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि) ने इस विधेयक को कुछ (legal technicalities in legislation) संदेशों के साथ वापस सरकार के पास भेज दिया है। इस फैसले ने राज्य की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि यह कानून प्रदेश में धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए सरकार का सबसे बड़ा हथियार माना जा रहा था।

आखिर क्यों अटकी राज्यपाल की मुहर
राजभवन के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस विधेयक के मसौदे में कुछ तकनीकी खामियां पाई गई हैं, जिन्हें ठीक किया जाना अनिवार्य है। विधेयक का ड्राफ्ट तैयार करते समय (legislative drafting errors) कुछ ऐसी विसंगतियां रह गईं, जिस कारण राज्यपाल ने इसे पुनर्विचार के लिए लौटाना उचित समझा। विधायी विभाग को मंगलवार को यह विधेयक वापस मिल गया है, जिसके बाद अब अधिकारी बारीकी से उन बिंदुओं का अध्ययन कर रहे हैं जो राजभवन की आपत्ति का कारण बने। सरकार की मंशा इस कानून को जल्द से जल्द जमीन पर उतारने की थी, लेकिन अब इसमें कुछ समय और लग सकता है।
सरकार के पास अब बचे हैं केवल दो रास्ते
इस महत्वपूर्ण कानून को लागू करने के लिए अब धामी सरकार के पास सीमित विकल्प बचे हैं। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, विधेयक के वापस होने के बाद अब (ordinance route for laws) सरकार या तो तत्काल प्रभाव से अध्यादेश लाने पर विचार कर सकती है या फिर अगले विधानसभा सत्र का इंतजार करना होगा। अगले सत्र में इस विधेयक को संशोधित रूप में दोबारा सदन के पटल पर रखा जाएगा और वहां से पारित कराकर पुनः मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। सरकार की प्राथमिकता इसे जल्द लागू करने की है ताकि समाज में एक सख्त संदेश दिया जा सके।
2018 से लेकर 2025 तक का सफर
उत्तराखंड में धर्म स्वतंत्रता कानून की यात्रा साल 2018 में शुरू हुई थी, जब पहली बार इसे लागू किया गया था। वक्त की मांग को देखते हुए धामी सरकार ने (anti conversion law amendments) वर्ष 2022 में भी इसमें कई महत्वपूर्ण बदलाव किए थे ताकि सजा के प्रावधानों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके। 13 अगस्त 2025 को कैबिनेट ने एक बार फिर सजा को और भी सख्त करने का संकल्प लिया और 20 अगस्त को गैरसैंण विधानसभा सत्र में इसे मंजूरी दी गई। यह सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है कि वह देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखने के लिए कितनी गंभीर है।
आजीवन कारावास जैसी कड़ी सजा का प्रावधान
नए संशोधन विधेयक की सबसे बड़ी ताकत इसमें प्रस्तावित कठोर सजाएं हैं। छल-कपट या प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराने वालों के लिए इस बार (strict criminal penalties) न्यूनतम 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं, दोषी पाए जाने पर 10 लाख रुपये तक का भारी जुर्माना भी देना होगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि नाबालिगों की तस्करी, दुष्कर्म या विवाह का झांसा देकर किए गए धर्मांतरण को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आरोपियों को समाज के लिए नजीर बनाया जाएगा।
डीएम को मिले गैंगस्टर एक्ट जैसे अधिकार
इस विधेयक में जिलाधिकारियों को भी अभूतपूर्व शक्तियां प्रदान की गई हैं, जो पहले के कानूनों में नहीं थीं। नए प्रावधानों के तहत (confiscation of property powers) अब धर्मांतरण के मामलों में डीएम को गैंगस्टर एक्ट की तर्ज पर आरोपियों की संपत्ति कुर्क करने का अधिकार होगा। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि संगठित रूप से धर्मांतरण कराने वाले सिंडिकेट की आर्थिक कमर तोड़ी जा सके। सरकार मानती है कि केवल जेल भेजने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अपराधियों के आर्थिक स्रोतों पर भी प्रहार करना आवश्यक है ताकि वे दोबारा ऐसा दुस्साहस न कर सकें।
शिकायत का दायरा हुआ अब और भी व्यापक
पुराने कानून में एक बड़ी बाधा यह थी कि धर्मांतरण के खिलाफ शिकायत केवल पीड़ित या उसके खून के रिश्तों तक ही सीमित थी। नए विधेयक में इस विसंगति को दूर करते हुए (public interest litigation) प्रावधान किया गया है कि अब कोई भी व्यक्ति इस अवैध गतिविधि के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकेगा। सामान्य धर्मांतरण के मामलों में भी जेल की सजा को बढ़ाकर अब 3 से 10 साल कर दिया गया है, जो पहले केवल 2 से 7 साल हुआ करती थी। यह बदलाव पुलिस और प्रशासन को अधिक मजबूती प्रदान करने वाला साबित होगा।
देवभूमि की मर्यादा बचाने की बड़ी चुनौती
एक तरफ जहां सरकार इस कानून को लागू करने के लिए जी-जान लगा रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य में बढ़ती आपराधिक घटनाएं भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। हाल ही में (Uttarakhand law and order challenges) कोहरे के कारण हुए हादसों और बसों पर लगी पाबंदियों ने भी प्रशासन के सामने चुनौतियां पेश की हैं। ऐसे माहौल में धर्मांतरण विरोधी कानून का राजभवन से वापस आना सरकार के लिए एक छोटा झटका जरूर है, लेकिन मुख्यमंत्री धामी का स्पष्ट रुख बताता है कि वे इन तकनीकी खामियों को दूर कर जल्द ही इसे प्रदेश में पूरी शक्ति के साथ लागू करेंगे।



