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Mumbai High Court: वायु प्रदूषण की आर्थिक कीमत पर ठोस अध्ययन जरूरी

Mumbai High Court: मुंबई हाईकोर्ट ने वायु प्रदूषण को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान मंगलवार को स्पष्ट किया कि इस गंभीर समस्या के आर्थिक प्रभावों का जल्द और व्यवस्थित आकलन किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि केवल सख्त टिप्पणियों या कड़े शब्दों के सहारे स्थिति में वास्तविक सुधार नहीं आएगा। कोर्ट की यह टिप्पणी उस वक्त आई, जब सुनवाई के दौरान वायु प्रदूषण के व्यापक आर्थिक नुकसान पर चर्चा हुई।

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Mumbai High Court: वायु प्रदूषण की आर्थिक कीमत पर ठोस अध्ययन जरूरी
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आईएमएफ की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री का हवाला

सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी डेरियस खंबाटा ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ के हालिया बयान का उल्लेख किया। गोपीनाथ ने स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की बैठक में कहा था कि भारत के लिए वायु प्रदूषण का खतरा आयात शुल्क जैसे टैरिफ से भी बड़ा आर्थिक जोखिम बन चुका है। खंबाटा ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि प्रदूषण के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान का आंकलन किए बिना नीति निर्माण अधूरा रहेगा।

प्रदूषण की लागत समझने पर जोर

हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि वायु प्रदूषण का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव उत्पादकता, कार्यबल की क्षमता और समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि समस्या की गंभीरता को समझने के लिए इसके आर्थिक पक्ष को सामने लाना जरूरी है, ताकि ठोस और प्रभावी उपाय किए जा सकें।

2023 में लिया गया था स्वतः संज्ञान

यह मामला नया नहीं है। मुंबई हाईकोर्ट ने बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते हुए वर्ष 2023 में स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद अदालत ने नगर निकायों और संबंधित प्राधिकारों को प्रदूषण नियंत्रण के लिए कई निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों का उद्देश्य शहर में हवा की गुणवत्ता में सुधार लाना और नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव को कम करना था।

पिछली सुनवाई में कड़ी नाराजगी

मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली पीठ ने 23 जनवरी को हुई पिछली सुनवाई में नगर निकाय अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जाहिर की थी। अदालत ने कहा था कि उसके आदेशों का जानबूझकर पालन नहीं किया जा रहा है। इस पर कोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका के शीर्ष अधिकारियों के वेतन पर रोक लगाने की चेतावनी तक दी थी, ताकि प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

मंगलवार की सुनवाई में क्या हुआ

मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने कोई नया औपचारिक निर्देश जारी नहीं किया, लेकिन महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणियां जरूर कीं। कोर्ट ने कहा कि जब तक प्रदूषण के आर्थिक प्रभावों को गंभीरता से नहीं समझा जाएगा, तब तक नीतिगत स्तर पर ठोस बदलाव संभव नहीं होंगे। पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि केवल कड़ी भाषा का इस्तेमाल करने से परिणाम हासिल नहीं किए जा सकते।

आगे की सुनवाई गुरुवार को

हाईकोर्ट ने मामले की आगे की सुनवाई गुरुवार के लिए स्थगित कर दी है। उम्मीद की जा रही है कि अगली सुनवाई में प्रदूषण से जुड़े आंकड़ों, प्रशासनिक कदमों और संभावित समाधान पर अधिक विस्तृत चर्चा होगी। अदालत का रुख साफ संकेत देता है कि वह इस मुद्दे को केवल पर्यावरणीय संकट के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक चुनौती के तौर पर भी देख रही है।

नीति और प्रशासन पर बढ़ता दबाव

कोर्ट की टिप्पणियों से यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में नगर निकायों और राज्य प्रशासन पर प्रदूषण नियंत्रण को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। वायु प्रदूषण से जुड़ी नीतियों में केवल अल्पकालिक उपायों के बजाय दीर्घकालिक और व्यावहारिक रणनीति अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है, ताकि शहर की हवा और अर्थव्यवस्था दोनों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

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