Ultrasound – खस्ता हालत! रिम्स में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट लेकर दर-दर रेंगने को मजबूर हुए मरीज
Ultrasound – रिम्स में अल्ट्रासाउंड जांच कराने वाले मरीजों को इन दिनों एक बड़ी व्यावहारिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में जांच प्रक्रिया तो नियमित रूप से की जा रही है, लेकिन जांच के बाद रिपोर्ट की प्रिंट फिल्म उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। इसके कारण मरीजों को न केवल अपनी जांच रिपोर्ट समझने में दिक्कत हो रही है, बल्कि आगे के इलाज की दिशा तय करने में भी परेशानी झेलनी पड़ रही है।

रिपोर्ट की जगह हाथ से लिखी जानकारी, स्पष्टता पर सवाल
अस्पताल से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अल्ट्रासाउंड जांच के बाद जूनियर डॉक्टर मरीजों को हाथ से लिखी रिपोर्ट सौंप रहे हैं। यह व्यवस्था अस्थायी रूप से अपनाई गई है, लेकिन इससे रिपोर्ट की गुणवत्ता और स्पष्टता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई मामलों में लिखावट साफ न होने के कारण मरीज या उनके परिजन रिपोर्ट ठीक से समझ नहीं पाते। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब मरीज किसी दूसरे विशेषज्ञ से सेकेंड ओपिनियन लेना चाहता है। विशेषज्ञों को हाथ से लिखी रिपोर्ट के आधार पर सही निष्कर्ष निकालने में कठिनाई होती है।
निजी केंद्रों से तुलना, सरकारी व्यवस्था पर उठे सवाल
निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों में जांच के बाद मरीजों को रिपोर्ट के साथ फिल्म भी दी जाती है, जिससे बीमारी की स्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इसके विपरीत, सरकारी अस्पताल में यह सुविधा न मिल पाने से मरीजों को असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। अल्ट्रासाउंड जांच कराने वालों में गर्भवती महिलाएं, पेट दर्द, किडनी, आंत और अन्य आंतरिक रोगों से जुड़े मरीज शामिल हैं, जिनके लिए स्पष्ट रिपोर्ट बेहद जरूरी होती है।
रोजाना 200 से अधिक जांच, सिस्टम पर बढ़ता दबाव
रिम्स और सदर अस्पताल में प्रतिदिन 200 से अधिक मरीज अल्ट्रासाउंड जांच के लिए पहुंच रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में जांच होने के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर लगातार दबाव बना हुआ है। सीमित संसाधनों और आवश्यक सामग्री की कमी के चलते अस्पताल प्रबंधन के सामने व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना चुनौती बन गया है। हालांकि मरीजों का कहना है कि समस्या लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन अब तक इसका स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है।
मरीजों की मांग, जल्द सुधरे व्यवस्था
अस्पताल में मौजूद मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि मुफ्त जांच की सुविधा सराहनीय है, लेकिन रिपोर्ट की फिल्म न मिलने से उन्हें निजी केंद्रों का सहारा लेना पड़ रहा है। कई सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे को लेकर स्वास्थ्य विभाग का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए यह स्थिति बेहद परेशान करने वाली है और व्यवस्था में शीघ्र सुधार किया जाना चाहिए।
आर्थिक बोझ बना बड़ी चिंता
फिल्म की अनुपलब्धता के कारण कई मरीजों को मजबूरी में निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों में दोबारा जांच करानी पड़ रही है। वहां एक जांच के लिए 800 से 1500 रुपये तक खर्च करना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह अतिरिक्त खर्च इलाज के बोझ को और बढ़ा देता है। मरीजों का कहना है कि यदि सरकारी अस्पताल में ही पूरी रिपोर्ट उपलब्ध करा दी जाए, तो उन्हें निजी केंद्रों पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।
लगातार शिकायतों के बावजूद समाधान नहीं
मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि वे रोजाना इस समस्या को लेकर शिकायत करते हैं। कई बार जांच केंद्र पर मौजूद कर्मचारियों से बहस की स्थिति भी बन जाती है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है। लोगों को उम्मीद है कि रिम्स प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए जल्द आवश्यक फिल्म की आपूर्ति सुनिश्चित करेगा, ताकि मरीजों को जांच के बाद पूरी और स्पष्ट रिपोर्ट मिल सके।



