Uttarakhand Indira Amma Canteen Crisis: उत्तराखंड में दम तोड़ रही है इंदिरा अम्मा कैंटीन, जिसका सरकारी फाइलों में दब गया नाम…
Uttarakhand Indira Amma Canteen Crisis: उत्तराखंड की पहाड़ियों और मैदानों में जब साल 2015 में ‘इंदिरा अम्मा भोजनालय’ योजना की नींव रखी गई थी, तब इसे केवल एक रसोई नहीं बल्कि स्वावलंबन का एक बड़ा आंदोलन माना गया था। तत्कालीन हरीश रावत सरकार का सपना था कि देवभूमि के हर जरूरतमंद को सम्मान के साथ सस्ता भोजन मिले। आज वह विजन (Uttarakhand Indira Amma Canteen Crisis) की दबकर रह गया है। 100 केंद्रों के लक्ष्य के साथ शुरू हुई यह यात्रा महज 42 पर आकर सिमट गई, और अब उनमें से भी 19 भोजनालयों पर ताले लटक चुके हैं। यह गिरावट केवल एक आंकड़े की कमी नहीं है, बल्कि उस भरोसे का टूटना है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति ने व्यवस्था पर किया था।

रसोइयों की खामोशी और बेरोजगार होती महिलाएं
इस योजना का सबसे खूबसूरत पहलू इसका महिला सशक्तीकरण से जुड़ा होना था। स्वयं सहायता समूहों के जरिए सैकड़ों महिलाएं न केवल अपनी आजीविका चला रही थीं, बल्कि समाज सेवा का एक बड़ा माध्यम भी बनी हुई थीं। दुर्भाग्यवश (women self help groups) को मिलने वाला सरकारी सहयोग और प्रोत्साहन समय के साथ धुंधला पड़ता गया। आज स्थिति यह है कि जैसे-जैसे कैंटीन बंद हो रही हैं, वैसे-वैसे इन महिलाओं के हाथों से रोजगार छिन रहा है। सिस्टम की यह सुस्ती न केवल एक अच्छी योजना को लील रही है, बल्कि उन मेहनतकश महिलाओं को भी वापस अंधेरे कमरों में धकेल रही है जिन्होंने आत्मनिर्भरता का सपना देखा था।
10 रुपये की सब्सिडी और बेनूर होती थालियां
इंदिरा अम्मा भोजनालय की सफलता का सबसे बड़ा आधार इसकी वह किफायती थाली थी, जिसमें सरकार 10 रुपये प्रति थाली की मदद देती थी। हैरानी की बात यह है कि बंद होने वाले 19 भोजनालयों में से दो तो ऐसे थे जो बिना किसी (government subsidy support) के भी हिम्मत दिखा रहे थे। जब बिना मदद के चलने वाली इकाइयां बंद हो सकती हैं, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रशासन की बेरुखी किस हद तक हावी रही होगी। पौष्टिक भोजन को आम आदमी की पहुंच में लाने का यह प्रयास अब सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़ रहा है, जिससे गरीब तबका एक बार फिर महंगे और असुरक्षित भोजन पर निर्भर होने को मजबूर है।
फाइलों में कैद है पुनरुद्धार की कार्ययोजना
हैरानी की बात यह है कि साल 2015 से लेकर अब तक शासन और प्रशासन के स्तर पर एक भी ऐसा ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे बंद हो चुके केंद्रों को दोबारा सक्रिय किया जा सके। नई (administrative policy implementation) के अभाव में यह योजना अब वेंटिलेटर पर नजर आ रही है। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, लेकिन गरीबों की थाली का यह संकट किसी भी राजनीतिक दल के मुख्य एजेंडे में स्थान नहीं बना पाया। जब तक नए सिरे से भोजनालयों को खोलने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाएगी, तब तक पुरानी गलतियों का बोझ जनता को ही ढोना पड़ेगा।
सचिव का आश्वासन और धरातल की कड़वी सच्चाई
ग्राम्य विकास विभाग के सचिव धीरज गब्रयाल ने इस मुद्दे पर सकारात्मक रुख दिखाते हुए कहा है कि यह एक बेहतरीन योजना है और इसे किसी भी कीमत पर बंद नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने जिलों से ताजा रिपोर्ट मांगी है ताकि (public welfare initiatives) को फिर से पटरी पर लाया जा सके। हालांकि, अधिकारी का यह भरोसा तब तक अधूरा है जब तक कि अपडेट मांगने की प्रक्रिया से आगे बढ़कर वास्तव में कैंटीन के चूल्हे नहीं जल जाते। लोगों को सस्ता और पौष्टिक आहार मिले, इसके लिए अब केवल आश्वासन नहीं बल्कि त्वरित और प्रभावी कार्यवाही की दरकार है।
ठिठुरती ठंड में गरीबों की आखिरी उम्मीद
उत्तराखंड इस समय भीषण शीतलहर की चपेट में है, जहाँ मसूरी की झीलें जम रही हैं और लोगों का जीवन दूभर हो गया है। ऐसे मौसम में इंदिरा अम्मा कैंटीन जैसे स्थान (affordable nutritious food) का सबसे बड़ा सहारा हुआ करते थे। गरम खाना और बैठने की जगह एक मजदूर या राहगीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। सिस्टम की काहिली का सबसे बड़ा खामियाजा इसी बेसहारा तबके को भुगतना पड़ रहा है, जिसके लिए भरपेट भोजन जुटाना इस मौसम में और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
क्या फिर से महकेगी इंदिरा अम्मा की रसोई
योजना को पुनर्जीवित करने के लिए विभाग अब नए सिरे से प्रयास करने का दावा कर रहा है। सचिव का कहना है कि बंद पड़े भोजनालयों को शुरू कराना उनकी प्राथमिकता है। यदि सरकार (sustainable livelihood models) को गंभीरता से लेती है, तो यह योजना न केवल फिर से फल-फूल सकती है, बल्कि राज्य की महिलाओं के लिए रोजगार का एक सशक्त जरिया भी बन सकती है। अब सवाल केवल बजट का नहीं है, बल्कि उस संवेदनशीलता का है जो किसी भी जन-कल्याणकारी योजना की आत्मा होती है। क्या आने वाले हफ्तों में हमें उन बंद तालों के पीछे फिर से हलचल सुनाई देगी, यह वक्त ही बताएगाuttarakhand-indira-amma