उत्तराखण्ड

CourtRelief – बेटी के इलाज के मामले में सिपाही बरी

CourtRelief – बेटी के दिल के ऑपरेशन के लिए ली गई अग्रिम राशि को गबन बताकर दर्ज किए गए मामले में अदालत ने महिला सिपाही को बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी माता-पिता के लिए अपने बच्चे की जान बचाना प्राथमिकता होती है, न कि उस समय कागजी औपचारिकताओं को पूरा करना।

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साक्ष्यों की कमी पर अदालत की टिप्पणी

प्रथम अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संजीव कुमार की अदालत ने सुनवाई के दौरान जांच प्रक्रिया में कई खामियां पाईं। अदालत ने माना कि समय पर बिल और वाउचर प्रस्तुत न कर पाना विभागीय लापरवाही हो सकती है, लेकिन इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस प्रमाणों से सिद्ध नहीं कर सका। ऐसे में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना न्यायसंगत है।

क्या था पूरा मामला

अभियोजन के अनुसार, महिला कांस्टेबल सुनीता ने अपनी बेटी के हृदय रोग के इलाज के लिए पुलिस मुख्यालय से जीवन रक्षक निधि के तहत 6.15 लाख रुपये और मुख्यमंत्री राहत कोष से 75 हजार रुपये प्राप्त किए थे। आरोप था कि दिल्ली के एक अस्पताल के नाम पर जमा किए गए अनुमान पत्र और लेटरहेड फर्जी थे।

जांच में संबंधित डॉक्टर के नाम को लेकर संदेह जताया गया और वर्ष 2017 में धोखाधड़ी व कूटरचना के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया। इसी आधार पर मामला अदालत तक पहुंचा।

एडवांस राशि को लेकर बचाव पक्ष की दलील

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यह रकम अनुदान नहीं थी, बल्कि अग्रिम भुगतान के रूप में दी गई थी, जिसकी वसूली वेतन से की जानी थी। अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों से स्पष्ट हुआ कि विभाग ने आरोपी के वेतन और अन्य देयकों से राशि की कटौती कर ली थी।

अदालत ने माना कि जब पूरी रकम वापस ले ली गई, तो सरकारी खजाने को कोई आर्थिक क्षति नहीं हुई। साथ ही आरोपी को भी कोई अनुचित लाभ प्राप्त नहीं हुआ।

मानवीय पहलू पर भी जोर

फैसले में न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण को भी महत्व दिया। अदालत ने कहा कि गंभीर बीमारी की स्थिति में माता-पिता का पहला उद्देश्य उपचार सुनिश्चित करना होता है। ऐसे समय में प्रक्रियात्मक चूक को सीधे आपराधिक मंशा से जोड़ना उचित नहीं है।

इस टिप्पणी को कानूनी हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि विभागीय त्रुटियों और आपराधिक कृत्यों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।

दूसरे मामले में भी आरोपी बरी

इसी अदालत ने एक अन्य मामले में प्रेम सिंह बिष्ट को छेड़छाड़ और जान से मारने की धमकी के आरोपों से मुक्त कर दिया। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि 21 मार्च 2018 को आरोपी ने उनका रास्ता रोका और पुराने मुकदमे को वापस लेने का दबाव बनाया।

बचाव पक्ष ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच पहले से मुकदमेबाजी चल रही थी और इसी रंजिश के कारण झूठा आरोप लगाया गया। अदालत ने पाया कि कथित घटना भीड़भाड़ वाले स्थान पर हुई बताई गई थी, लेकिन पुलिस ने न तो सीसीटीवी फुटेज जुटाया और न ही स्वतंत्र गवाह प्रस्तुत किए। पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया।

इन दोनों फैसलों में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि उन्हें ठोस प्रमाणों से साबित करना आवश्यक है।

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