BoardExam – जानें परीक्षा के बाद बच्चों से क्या न पूछें माता-पिता…
BoardExam – बोर्ड परीक्षा का समय हर परिवार के लिए संवेदनशील दौर होता है। छात्र महीनों की तैयारी के बाद जब परीक्षा कक्ष से बाहर निकलते हैं, तो उनके मन में पहले से ही कई सवाल चल रहे होते हैं। ऐसे में घर लौटते ही अगर उन पर सवालों की बौछार कर दी जाए, तो उनका आत्मविश्वास डगमगा सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि परीक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी है बच्चों का मानसिक संतुलन बनाए रखना। खासकर यूपी बोर्ड परीक्षा जैसे बड़े मूल्यांकन के दौरान माता-पिता का व्यवहार बच्चों के मनोबल पर सीधा असर डालता है।

नंबरों का सीधा सवाल बढ़ा सकता है दबाव
अक्सर देखा जाता है कि पेपर खत्म होते ही पहला सवाल यही होता है—इस बार कितने नंबर आएंगे? या फिर पास तो हो जाओगे ना? यह स्वाभाविक जिज्ञासा हो सकती है, लेकिन बच्चे के लिए यह तनाव का कारण बन जाती है। परीक्षा के तुरंत बाद छात्र खुद भी अपने प्रदर्शन को लेकर अनिश्चित होते हैं। ऐसे में अंकों का अनुमान लगाने के लिए दबाव बनाना उन्हें अगले पेपर की तैयारी से भटका सकता है। बेहतर होगा कि उनसे सहज तरीके से पूछा जाए कि पेपर कैसा रहा और आगे की तैयारी कैसी चल रही है। इससे संवाद भी बना रहेगा और दबाव भी नहीं बढ़ेगा।
गलतियों की टोह लेना ठीक नहीं
कुछ माता-पिता यह जानने की कोशिश करते हैं कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई। यह सवाल सुनने में सामान्य लगता है, लेकिन बच्चे के मन में पहले से मौजूद आशंका को और बढ़ा सकता है। कई बार परीक्षा के बाद छात्र अपने जवाबों को लेकर असमंजस में रहते हैं। ऐसे में गलती का जिक्र उन्हें असहज कर सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि कोई त्रुटि हो भी गई हो तो उसे अगली परीक्षा के लिए सीख के रूप में लिया जाए। बच्चों को यह भरोसा देना ज्यादा जरूरी है कि एक पेपर पूरे भविष्य का फैसला नहीं करता।
उच्च प्रतिशत की उम्मीद का बोझ
कुछ घरों में परीक्षा के दौरान ही प्रतिशत तय कर दिए जाते हैं—90 प्रतिशत से कम नहीं आना चाहिए। हर पेपर के बाद यही सवाल दोहराया जाए तो छात्र पर अनावश्यक दबाव बनता है। लगातार प्रदर्शन का आकलन करने की कोशिश उन्हें मानसिक रूप से थका सकती है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि परिणाम से ज्यादा जरूरी निरंतर प्रयास है। अगर बच्चा मेहनत कर रहा है तो उसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए, न कि बार-बार लक्ष्य की याद दिलाकर तनाव बढ़ाया जाए।
दूसरों से तुलना से बचें
तुलना अक्सर अनजाने में की जाती है, लेकिन इसका असर गहरा होता है। यह कहना कि किसी और छात्र का पेपर बेहतर गया या उसने पिछले साल इतने अंक हासिल किए थे, बच्चे के आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकता है। हर छात्र की तैयारी, समझ और परिस्थिति अलग होती है। तुलना से प्रेरणा कम और दबाव ज्यादा पैदा होता है। ऐसे समय में माता-पिता का समर्थन ही बच्चे को संतुलित रख सकता है।
रिश्तेदारों का हवाला न दें
कुछ परिवारों में परीक्षा के परिणाम को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है। बच्चों से यह कहना कि अच्छे नंबर नहीं आए तो रिश्तेदार क्या कहेंगे, उन्हें मानसिक रूप से बोझिल कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की बातें बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हटाकर बाहरी दबाव की ओर मोड़ देती हैं। परीक्षा व्यक्तिगत प्रयास का मूल्यांकन है, न कि सामाजिक प्रतिष्ठा की कसौटी। यदि परिवार सहयोगी वातावरण बनाए रखे तो छात्र बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
परीक्षा के दौरान सबसे ज्यादा जरूरत समझ और संवाद की होती है। बच्चों से सकारात्मक बातचीत, उनका मन हल्का करने और उन्हें आगे की तैयारी के लिए प्रेरित करने में मदद करती है। माता-पिता का संतुलित रवैया ही परीक्षा के इस दौर को सहज बना सकता है।