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FreebiesPolicy – चुनावी मुफ्त योजनाओं से राज्यों के बजट पर बढ़ता दबाव

FreebiesPolicy – चुनावी राजनीति में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राज्यों द्वारा घोषित की जाने वाली मुफ्त योजनाएं और नकद सहायता कार्यक्रम लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक की एक शोध रिपोर्ट में इन योजनाओं के आर्थिक प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, चुनावी वादों के रूप में दी जाने वाली मुफ्त सुविधाएं और सीधे बैंक खातों में नकद हस्तांतरण कई राज्यों के बजट पर उल्लेखनीय बोझ डाल रहे हैं। इससे कई बार सरकारों की अन्य आवश्यक विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन सीमित हो सकते हैं।

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एसबीआई रिपोर्ट में सामने आए खर्च के आंकड़े

एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट में राज्यों के बजट और चुनावी घोषणाओं का विश्लेषण किया गया है। इसमें पाया गया कि अलग-अलग राज्यों में चुनाव के दौरान किए गए मुफ्त योजनाओं से जुड़े वादों पर होने वाला खर्च राज्य के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी के लगभग 0.1 प्रतिशत से लेकर 2.7 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार यह खर्च कई मामलों में राज्यों की कुल राजस्व प्राप्ति का लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के खर्च पर कोई संतुलन नहीं रखा गया तो इससे सरकारों के लिए बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य दीर्घकालिक विकास परियोजनाओं पर निवेश करना कठिन हो सकता है। इसी कारण रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि मुफ्त योजनाओं पर होने वाले खर्च की एक स्पष्ट सीमा तय की जानी चाहिए ताकि वित्तीय संतुलन बना रहे।

मुफ्त योजनाओं पर खर्च की सीमा तय करने की सिफारिश

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि राज्यों को मुफ्त उपहार या नकद सहायता योजनाओं पर खर्च को सीमित रखने के लिए एक तय सीमा निर्धारित करनी चाहिए। इसके अनुसार इस तरह की योजनाओं पर होने वाला कुल खर्च जीएसडीपी के एक प्रतिशत के आसपास सीमित किया जा सकता है। इससे सरकारें वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए जरूरतमंद लोगों की सहायता भी कर सकेंगी।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार चुनावी माहौल में राजनीतिक दल बड़ी संख्या में लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा कर देते हैं। इससे अल्पकालिक राजनीतिक लाभ भले मिल जाए, लेकिन लंबे समय में राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट का उद्देश्य इसी संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करना है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी जताई चिंता

मुफ्त योजनाओं को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत भी पहले चिंता व्यक्त कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों से ठीक पहले विभिन्न राज्यों द्वारा घोषित की जाने वाली ऐसी योजनाओं पर सवाल उठाए थे, जिनमें सीधे नकद सहायता या अन्य प्रकार के मुफ्त लाभ शामिल होते हैं।

अदालत का कहना था कि सरकारों को ऐसी नीतियों पर विचार करते समय दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि नागरिकों को सीधे आर्थिक सहायता देने के बजाय रोजगार के अवसर बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि लोग स्वयं आय अर्जित कर सकें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।

जरूरतमंद और सक्षम लोगों के बीच अंतर जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को सहायता देना होना चाहिए। लेकिन यदि बिना किसी स्पष्ट मानदंड के सभी को समान रूप से मुफ्त लाभ दिए जाते हैं तो इससे नीति के मूल उद्देश्य पर सवाल उठ सकते हैं।

अदालत के अनुसार सरकारों को यह स्पष्ट रूप से तय करना चाहिए कि किन लोगों को सहायता की वास्तव में जरूरत है। जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं और स्वयं खर्च कर सकते हैं, उनके लिए मुफ्त योजनाएं लागू करना संसाधनों के उचित उपयोग पर प्रश्न खड़े कर सकता है। इसलिए सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर योजनाओं का लक्ष्य तय करना अधिक प्रभावी माना जाता है।

महिला केंद्रित योजनाओं से मतदान में बढ़ोतरी

एसबीआई की रिपोर्ट में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है। जिन राज्यों में महिलाओं को ध्यान में रखते हुए विशेष योजनाएं लागू की गई हैं, वहां मतदान में महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार जिन राज्यों में एक या उससे अधिक महिला केंद्रित योजनाएं लागू हैं, वहां 2024 के चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या औसतन लगभग 7.8 लाख बढ़ी है। कुल मिलाकर इन राज्यों में करीब 1.5 करोड़ महिलाओं ने मतदान में भागीदारी दर्ज कराई।

इसके विपरीत जिन राज्यों में वर्ष 2019 के बाद ऐसी कोई योजना शुरू नहीं की गई, वहां महिला मतदाताओं की संख्या में अपेक्षाकृत कम वृद्धि देखी गई। इन राज्यों में औसतन लगभग 2.5 लाख महिलाओं की भागीदारी बढ़ी, जो कुल मिलाकर लगभग 30 लाख के आसपास रही। रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि महिलाओं को लक्षित कर बनाई गई योजनाएं उनकी राजनीतिक भागीदारी को भी प्रभावित कर सकती हैं।

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