SupremeCourt – जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी, युवा वकीलों को मिली नसीहत
SupremeCourt – उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए युवा वकीलों को कड़ी सलाह दी कि वे केवल चर्चा या प्रचार पाने के उद्देश्य से अदालत में याचिकाएं दाखिल करने से बचें। अदालत ने कहा कि पेशे की शुरुआत करने वाले अधिवक्ताओं को पहले कानून की समझ विकसित करने, शोध करने और ड्राफ्टिंग कौशल सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। न्यायालय का यह रुख उस याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें सार्वजनिक ढांचे के रखरखाव में कथित लापरवाही से होने वाली मौतों को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई थी।

पीठ ने याचिका को बताया अस्पष्ट और व्यापक
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका की सामग्री पर असंतोष जताते हुए इसे खारिज कर दिया। अदालत का कहना था कि याचिका में ऐसे व्यापक और अस्पष्ट दावे किए गए हैं जिन पर व्यावहारिक रूप से कोई स्पष्ट निर्देश जारी करना संभव नहीं है।
पीठ ने कहा कि जनहित याचिका के माध्यम से अदालत से जो निर्देश मांगे गए हैं, वे अत्यधिक व्यापक हैं और उनके क्रियान्वयन की स्पष्ट रूपरेखा भी सामने नहीं रखी गई है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग उचित नहीं मानी जा सकती। इसी कारण अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया।
अदालत ने उठाए कई प्रारंभिक सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता की वकील से यह भी पूछा कि जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है, उससे जुड़े संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सीधे शिकायत दर्ज क्यों नहीं कराई गई। पीठ का मानना था कि यदि किसी विशेष मामले में लापरवाही हुई है तो पहले उस मामले में जिम्मेदार एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जानी चाहिए।
वकील ने अदालत को बताया कि यह समस्या केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्सों में सार्वजनिक ढांचे के रखरखाव से जुड़े मामलों में ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। इसलिए इसे व्यापक स्तर का मुद्दा बताते हुए अदालत से दिशानिर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया था।
युवा वकीलों को पेशे पर ध्यान देने की सलाह
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने वकील से उनके पेशे के अनुभव के बारे में भी पूछा। जब उन्होंने बताया कि वह करीब चार वर्षों से वकालत कर रही हैं, तब अदालत ने उन्हें और अन्य युवा अधिवक्ताओं को पेशे के शुरुआती दौर में सीखने पर ध्यान देने की सलाह दी।
पीठ ने कहा कि नए वकीलों को वरिष्ठों के मार्गदर्शन में काम करते हुए कानून की बारीकियों और ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया को समझना चाहिए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल चर्चा में आने या सोशल मीडिया पर ध्यान आकर्षित करने के लिए आधारहीन याचिकाएं दाखिल करना पेशे के लिए सही प्रवृत्ति नहीं है।
कई अन्य याचिकाएं भी अदालत ने खारिज कीं
उसी दिन अदालत ने एक अन्य वकील द्वारा दाखिल पांच जनहित याचिकाओं को भी निरर्थक बताते हुए खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में कई ऐसे विषय उठाए गए थे जिन्हें अदालत ने न्यायिक हस्तक्षेप के लिए उपयुक्त नहीं माना।
इनमें से एक याचिका में यह मांग की गई थी कि यह पता लगाने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए कि प्याज और लहसुन में तथाकथित तामसिक ऊर्जा होती है या नहीं। अदालत ने इस प्रकार की मांग को भी न्यायिक प्रक्रिया के दायरे से बाहर माना।
इसके अलावा एक याचिका में शराब और तंबाकू उत्पादों में मौजूद कथित हानिकारक तत्वों को नियंत्रित करने के लिए निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। एक अन्य याचिका में संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण से संबंधित दिशा-निर्देश तय करने की अपील की गई थी, जबकि एक याचिका में शास्त्रीय भाषाओं की घोषणा से जुड़ी प्रक्रिया तय करने का अनुरोध किया गया था।
जनहित याचिका के उपयोग पर अदालत का संकेत
अदालत की टिप्पणियों को कानूनी विशेषज्ञ जनहित याचिकाओं के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता के रूप में देख रहे हैं। न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि जनहित याचिका एक महत्वपूर्ण संवैधानिक माध्यम है, लेकिन इसका उपयोग गंभीर और ठोस मामलों में ही होना चाहिए।
अदालत का यह भी मानना है कि न्यायिक संसाधनों का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए जिनमें स्पष्ट तथ्य, ठोस आधार और व्यावहारिक समाधान की संभावना मौजूद हो। इसी दृष्टिकोण के तहत अदालत ने संबंधित याचिकाओं को खारिज करते हुए वकीलों को पेशेवर जिम्मेदारी के साथ काम करने की सलाह दी।



