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ArtificialIntelligence – अदालतों में AI के बढ़ते उपयोग पर जजों ने जताई चिंता

ArtificialIntelligence – न्याय व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग को लेकर भारत और विदेशों के कई वरिष्ठ न्यायाधीशों ने चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि तकनीक न्यायिक प्रक्रिया को आसान बना सकती है, लेकिन इसके उपयोग में सावधानी बेहद जरूरी है। विशेष रूप से अदालतों में प्रस्तुत की जाने वाली जानकारी की सत्यता को लेकर AI टूल्स पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।

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यह मुद्दा हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी चर्चा के दौरान प्रमुखता से सामने आया। विशेषज्ञों ने वकीलों को सलाह दी कि AI आधारित प्लेटफॉर्म से प्राप्त जानकारी का उपयोग करने से पहले उसकी विश्वसनीयता और स्रोत की सही तरीके से जांच अवश्य करनी चाहिए।

न्यायिक चर्चा में सामने आई चिंताएं

चंडीगढ़ में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी कार्यक्रम के दौरान न्यायपालिका में तकनीक की भूमिका पर विस्तृत चर्चा हुई। यह कार्यक्रम इंडिया इंटरनेशनल डिस्प्यूट वीक 2026 के तहत आयोजित किया गया था, जिसमें भारत के साथ-साथ ब्रिटेन और अमेरिका के न्यायाधीशों ने भी भाग लिया।

इस चर्चा के दौरान कई जजों ने कहा कि अगर बिना सत्यापन के AI टूल्स से मिली जानकारी अदालत में पेश की जाती है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। उनका मानना है कि तकनीक उपयोगी है, लेकिन इसे अंतिम सत्य मान लेना सही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट कर रहा है दिशा-निर्देशों पर विचार

राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण मोंगा ने कहा कि AI से तैयार की गई सामग्री को उसके मूल स्रोत से मिलान करना बेहद जरूरी है। उन्होंने एक हालिया घटना का जिक्र किया जिसमें एक ट्रायल कोर्ट के आदेश में ऐसे केस लॉ का उल्लेख किया गया था जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं था।

उन्होंने बताया कि इस तरह की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को लेकर कुछ दिशा-निर्देश तैयार करने पर विचार कर रहा है। यह पहल संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत की जा सकती है ताकि न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट नियम तय किए जा सकें।

अदालतों में AI की गलतियों से बढ़ सकती है परेशानी

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद भारद्वाज ने कहा कि तकनीक ने न्यायिक व्यवस्था को कई मामलों में सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके गलत उपयोग से समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक याचिका में वकील ने एक ऐसे फैसले का हवाला दिया जिसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। अदालत के शोधकर्ताओं द्वारा जांच करने पर भी वह मामला कहीं दर्ज नहीं मिला। ऐसी स्थिति में अदालतों का अतिरिक्त समय जांच-पड़ताल में लग जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में वकील हाइब्रिड सुनवाई प्रणाली का फायदा उठाकर मामलों की सुनवाई टालने की कोशिश करते हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की गति प्रभावित होती है।

न्यायिक फैसलों में मानव भूमिका जरूरी

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति हाकेश मनुजा ने कहा कि AI को पूरी तरह न्यायिक निर्णय प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। उनके अनुसार यह तकनीक न्यायिक कार्य में सहायक भूमिका निभा सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा मानव विवेक से ही होना चाहिए।

उन्होंने बताया कि कुछ अदालतों में AI आधारित टूल्स का प्रयोग केस फाइलों और दलीलों का संक्षिप्त सार तैयार करने के लिए किया जा रहा है। इससे जजों को फैसले लिखने में अधिक समय मिल सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह की जानकारी को भी सावधानीपूर्वक जांचना जरूरी है।

विदेशी न्यायाधीशों ने भी साझा किए अनुभव

ब्रिटेन के फर्स्ट टियर ट्रिब्यूनल के न्यायाधीश सुखी गिल ने कहा कि कई बार AI से तैयार सामग्री के कारण वकीलों को अदालत में असहज स्थिति का सामना करना पड़ा है। उन्होंने सलाह दी कि किसी भी AI आधारित जानकारी को कानून और संबंधित मामलों के रिकॉर्ड से मिलान करना जरूरी है।

उन्होंने यह भी बताया कि ब्रिटेन में तकनीक का उपयोग अनावश्यक अपीलों को कम करने और मामलों की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए किया जा रहा है।

वहीं अमेरिका के टेक्सास स्थित हैरिस काउंटी सिविल कोर्ट की न्यायाधीश मनप्रीत मोनिका सिंह ने बताया कि अमेरिका में अदालतों की फाइलों का डिजिटलीकरण पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हुआ है। उनके अनुसार तकनीक ने मामलों की सुनवाई को अधिक व्यवस्थित बनाया है, हालांकि न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय विवेक की भूमिका अभी भी सबसे महत्वपूर्ण बनी हुई है।

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