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DigitalCensorship – सोशल मीडिया अकाउंट बंद होने पर उठे गंभीर सवाल

DigitalCensorship – देश में हाल के दिनों में कई डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म और कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए जाने के बाद एक नई बहस शुरू हो गई है। इस कदम को लेकर पत्रकार संगठनों और विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने इस कार्रवाई को ऑनलाइन सेंसरशिप बताते हुए इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर मुद्दा कहा है। वहीं, इस पूरे मामले पर सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई के दावे

राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि कई न्यूज प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटरों के अकाउंट अचानक बंद कर दिए गए। उन्होंने दावा किया कि कुछ यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज, जो खबरें और विश्लेषण साझा करते थे, उन पर पाबंदी लगाई गई है।

उनके अनुसार, यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना बढ़ रही है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

प्रेस क्लब ने जताई आपत्ति

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर कंटेंट हटाने या अकाउंट ब्लॉक करने की घटनाएं चिंता का विषय हैं। संगठन ने कहा कि बिना स्पष्ट कारण और पारदर्शिता के इस तरह की कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।

प्रेस क्लब ने यह भी मांग की कि यदि किसी प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, तो उसके पीछे स्पष्ट कारण और प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए।

विपक्षी नेताओं ने भी उठाए सवाल

इस मुद्दे को लेकर कुछ विपक्षी नेताओं ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस तरह की निगरानी बढ़ती है, तो स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि पहले पारंपरिक मीडिया पर प्रभाव बढ़ा और अब डिजिटल माध्यमों पर भी नियंत्रण की कोशिश हो रही है। वहीं, अन्य नेताओं ने भी इस विषय को संसद में उठाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा की जरूरत बताई।

बिना पूर्व सूचना के कार्रवाई का दावा

कुछ प्रभावित प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगों का कहना है कि उनके अकाउंट बिना किसी पूर्व सूचना के बंद कर दिए गए। एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की प्रतिनिधि ने बताया कि उन्हें देर रात एक नोटिफिकेशन मिला, जिसमें कहा गया कि कानूनी प्रावधानों के तहत उनके कंटेंट की पहुंच सीमित कर दी गई है।

हालांकि, उनका कहना है कि इससे पहले उन्हें कोई चेतावनी या कारण नहीं बताया गया था। अब वे इस मामले में कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।

छोटे प्लेटफॉर्म के सामने चुनौती

कुछ छोटे और स्वतंत्र मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बताई जा रही है। ऐसे प्लेटफॉर्म के संचालकों का कहना है कि उनके पास बड़े मीडिया संस्थानों जैसी कानूनी या आर्थिक क्षमता नहीं होती, जिससे वे तुरंत अदालत का रुख कर सकें।

उनका मानना है कि इस तरह की कार्रवाई से वैकल्पिक और जमीनी स्तर की आवाजों पर असर पड़ सकता है, खासकर वे प्लेटफॉर्म जो सामाजिक मुद्दों को उठाते हैं।

सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार

इस पूरे मामले में अब तक सरकार की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से प्रतिक्रिया मांगी गई है, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला था।

ऐसे में यह मुद्दा आने वाले दिनों में और चर्चा का विषय बन सकता है, खासकर तब जब डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका लगातार बढ़ रही है और उनसे जुड़े नियमों को लेकर स्पष्टता की जरूरत महसूस की जा रही है।

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