Geopolitics – अमेरिका-ईरान युद्धविराम में पाकिस्तान की भूमिका पर चर्चा तेज
Geopolitics – अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए युद्धविराम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छिड़ गई है। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर कई संकेत सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान के नेतृत्व का उल्लेख किया है, जबकि ईरान की ओर से भी इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की भागीदारी को नकारा नहीं गया। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि दोनों देशों ने पाकिस्तान पर भरोसा क्यों किया और उसकी मध्यस्थता को किस आधार पर स्वीकार किया।

अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों में हालिया नजदीकी
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के मौजूदा कार्यकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में कुछ सुधार देखने को मिला है। इसी कड़ी में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के साथ अमेरिकी नेतृत्व की बातचीत को अहम माना जा रहा है। जानकारी के अनुसार, युद्धविराम से पहले ट्रंप ने पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत की थी। अपने एक सोशल मीडिया संदेश में उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पाकिस्तान की ओर से तनाव कम करने की अपील की गई थी, जिसके बाद अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया।
ईरान ने भी जताया सहयोग के लिए आभार
ईरान की तरफ से भी पाकिस्तान के प्रयासों को सकारात्मक रूप में देखा गया है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए पाकिस्तान ने सक्रिय भूमिका निभाई। यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि दोनों देशों के बीच संवाद कायम कराने में पाकिस्तान एक कड़ी के रूप में सामने आया।
भौगोलिक और कूटनीतिक कारण भी अहम
पाकिस्तान की ईरान के साथ साझा सीमा है और दोनों देशों के बीच लंबे समय से कूटनीतिक संबंध बने हुए हैं। यही वजह है कि संकट की स्थिति में संवाद के लिए पाकिस्तान एक उपयुक्त माध्यम बन सकता है। दूसरी ओर, पाकिस्तान और इजरायल के बीच औपचारिक संबंध नहीं हैं, जिससे ईरान को उसके रुख पर भरोसा करने में आसानी हुई। क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए यह संतुलन भी मध्यस्थता में सहायक साबित हो सकता है।
समझौते की संभावित शर्तों पर नजर
सूत्रों के मुताबिक, इस युद्धविराम में कई महत्वपूर्ण शर्तें शामिल हो सकती हैं। इनमें आपसी हमलों को रोकना, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण बनाए रखना, परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ अधिकारों की अनुमति और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि इन शर्तों की आधिकारिक पुष्टि अलग-अलग स्तर पर अभी बाकी है।
चीन की भूमिका को लेकर भी चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन ने पर्दे के पीछे रहकर ईरान को बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश की। बताया जा रहा है कि चीन ने पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देशों के साथ मिलकर मध्यस्थता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहयोग किया।



