उत्तर प्रदेश

AlimonyCase – सख्त हुआ हाईकोर्ट, पति की याचिका खारिज कर लगाया 15 लाख का जुर्माना

AlimonyCase – इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए पति की याचिका को खारिज कर दिया है और उस पर 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विवाह का संबंध किसी भी प्रकार के शोषण का माध्यम नहीं बन सकता। न्यायालय ने यह भी माना कि इस तरह के मामलों में सख्ती जरूरी है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग रोका जा सके।

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पति की याचिका पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

यह मामला रंजीत सिंह द्वारा दाखिल याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने इटावा की फैमिली कोर्ट में लंबित भरण-पोषण मामले के शीघ्र निपटारे की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने खुद को बेरोजगार बताते हुए कहा कि उसकी कोई आय नहीं है, जबकि उसकी पत्नी एक सरकारी पद पर कार्यरत है। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत को कई ऐसे तथ्य मिले, जिनसे याचिकाकर्ता के दावे संदिग्ध साबित हुए।

पत्नी के आरोपों ने बदली तस्वीर

पत्नी की ओर से पेश किए गए तथ्यों ने मामले को नया मोड़ दिया। उसने बताया कि पति ने उसके बैंक खाते से बड़ी रकम के दो व्यक्तिगत ऋण लिए थे, जिनकी कुल राशि लाखों में थी। आरोप है कि इन पैसों का उपयोग व्यक्तिगत ऐशो-आराम और शराब पर किया गया। वहीं, इन ऋणों की मासिक किस्त अब भी पत्नी ही चुका रही है, जिससे उस पर आर्थिक दबाव बना हुआ है।

महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने पर नाराजगी

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने कई अहम जानकारियां छिपाई थीं। वह पहले से ही एक अन्य मामले में पत्नी से अंतरिम भरण-पोषण प्राप्त कर रहा था, लेकिन इस तथ्य का जिक्र उसने अपनी याचिका में नहीं किया। अदालत ने इसे गंभीर चूक मानते हुए कहा कि न्यायालय से सच्चाई छिपाना स्वीकार्य नहीं है।

सक्षम होने के बावजूद भरण-पोषण की मांग

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता पेशे से वकील है और पूरी तरह स्वस्थ है। ऐसे में वह अपनी पत्नी पर निर्भर होकर भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून उन लोगों की मदद के लिए है जो वास्तव में जरूरतमंद हैं, न कि उनके लिए जो अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करते हैं।

15 लाख का हर्जाना, सख्त निर्देश

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता के आचरण को अनुचित बताते हुए उस पर 15 लाख रुपये का हर्जाना लगाया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि छह सप्ताह के भीतर पत्नी को दी जाए। यदि भुगतान नहीं किया जाता है, तो प्रशासन को यह रकम वसूलने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है।

संपत्ति पर रोक और आगे की कार्रवाई

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि हर्जाने की वसूली तक याचिकाकर्ता अपनी किसी भी संपत्ति को बेच या हस्तांतरित नहीं कर सकेगा। साथ ही फैमिली कोर्ट को यह भी कहा गया है कि झूठा हलफनामा दाखिल करने के मामले में उचित कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाए। इसके अलावा, पत्नी की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आगे की सुनवाई बंद कमरे में करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर संदेश

इस फैसले के जरिए अदालत ने साफ संकेत दिया है कि न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ सख्ती बरती जाएगी। यह निर्णय न केवल इस मामले में राहत प्रदान करता है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक स्पष्ट संदेश देता है कि अदालत तथ्यों और सच्चाई के आधार पर ही निर्णय लेती है।

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