KailashYatra – लिपुलेख मार्ग पर नेपाल ने जताया कड़ा विरोध, बढ़ी कूटनीतिक हलचल
KailashYatra – भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर बनी सहमति के बाद नेपाल की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। काठमांडू ने साफ किया है कि लिपुलेख क्षेत्र से होने वाली किसी भी गतिविधि पर उसे आपत्ति है। नेपाल सरकार का कहना है कि इस मार्ग से यात्रा, व्यापार या निर्माण जैसे किसी भी कदम को वह स्वीकार नहीं करेगी। इस बयान के बाद क्षेत्रीय स्तर पर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है।

नेपाल ने दोहराया अपना पुराना रुख
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इस मामले में छह बिंदुओं वाला बयान जारी किया है। इसमें कहा गया है कि सरकार ने भारत और चीन दोनों के सामने अपना पक्ष कूटनीतिक माध्यम से रख दिया है। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख उसका हिस्सा है, इसलिए वहां से किसी भी तरह की गतिविधि उसकी संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस रुख में कोई बदलाव नहीं किया गया है और यह पहले की सरकारों के रुख के अनुरूप ही है।
भारत-चीन समझौते के बाद आया बयान
यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब भारत और चीन ने हाल ही में कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने की योजना घोषित की है। प्रस्ताव के अनुसार, कुल एक हजार श्रद्धालुओं को यात्रा पर भेजा जाएगा। इनमें से आधे यात्री उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से और बाकी सिक्किम के नाथुला मार्ग से जाएंगे। यात्रियों को चरणबद्ध तरीके से समूहों में भेजने की योजना बनाई गई है। इस घोषणा को नेपाल में भी प्रमुखता से देखा गया, क्योंकि लिपुलेख को लेकर पहले से ही विवाद बना हुआ है।
सीमा विवाद की जड़ में ऐतिहासिक मतभेद
भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लेकर लंबे समय से मतभेद हैं। नेपाल का दावा सुगौली संधि के आधार पर है, जिसके अनुसार महाकाली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा को माना जाता है। इस आधार पर नेपाल इन क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताता है। वहीं भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत लिपुखोला के पास है, जिससे यह क्षेत्र भारतीय सीमा में आते हैं। यही अलग-अलग व्याख्या इस विवाद की मुख्य वजह है।
2020 में विवाद ने पकड़ा था जोर
इस मुद्दे ने वर्ष 2020 में ज्यादा तूल पकड़ा था, जब भारत ने लिपुलेख तक सड़क निर्माण पूरा किया। इसे भारत ने रणनीतिक और धार्मिक दृष्टि से अहम बताया, लेकिन नेपाल की तत्कालीन सरकार ने इसे आपत्तिजनक कदम करार दिया। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें इन विवादित क्षेत्रों को शामिल किया गया। इस घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव देखा गया था।
नई सरकार से थी रिश्तों में सुधार की उम्मीद
नेपाल में नई सरकार के गठन के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि भारत-नेपाल संबंधों में सुधार आएगा। दोनों देशों के बीच संवाद भी जारी है, लेकिन मानसरोवर यात्रा के मुद्दे ने एक बार फिर संवेदनशीलता बढ़ा दी है। यात्रा के ऐलान के बाद नेपाल सरकार की शुरुआती चुप्पी पर भी सवाल उठे थे, जिसके बाद अब यह स्पष्ट बयान सामने आया है।
आगे की स्थिति पर रहेगी नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सीमा और संप्रभुता से जुड़े पहलू भी शामिल हैं। ऐसे में आने वाले समय में भारत, नेपाल और चीन के बीच बातचीत की दिशा महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल नेपाल ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है, जिससे इस मुद्दे पर आगे कूटनीतिक स्तर पर संवाद की संभावना बनी हुई है।