JusticeCase – रामपुर तिराहा कांड में हाई कोर्ट ने मांगी जांच रिपोर्ट
JusticeCase – उत्तराखंड आंदोलन के दौरान हुए चर्चित रामपुर तिराहा गोलीकांड मामले में हाई कोर्ट ने एक बार फिर जांच एजेंसियों से जवाब तलब किया है। मामले की सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो को निर्देश दिया है कि वह 15 दिनों के भीतर पूर्व जिलाधिकारी अनंत कुमार से जुड़े प्रकरण की वर्तमान स्थिति अदालत के सामने स्पष्ट करे। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने यह आदेश मंगलवार को सुनवाई के दौरान दिया।

यह मामला लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया में है और अब तक जांच की प्रगति को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। अदालत में पेश हुए उत्तराखंड आंदोलनकारी अधिवक्ता मंच के अध्यक्ष और याचिकाकर्ता रमन शाह ने कहा कि पहले भी जांच की स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अब तक न तो सीबीआई और न ही उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से संतोषजनक जानकारी दी गई है।
सीबीआई ने मांगा अतिरिक्त समय
सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य गठन से पहले यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। बाद में शीर्ष अदालत ने इसे इलाहाबाद हाई कोर्ट को स्थानांतरित कर दिया था। एजेंसी ने यह भी कहा कि उत्तराखंड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के माध्यम से मामले की फाइलें देहरादून से मुजफ्फरनगर भेजी गई थीं।
सीबीआई ने अदालत से मौजूदा स्थिति स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की। अदालत ने एजेंसी की दलील स्वीकार करते हुए 15 दिन के भीतर पूरी स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब अगली सुनवाई में एजेंसी को मामले की प्रगति और जांच की दिशा पर स्पष्ट जानकारी देनी होगी।
केस ट्रांसफर पर भी उठे सवाल
याचिकाकर्ता रमन शाह ने देहरादून स्थित सीबीआई अदालत द्वारा इस मामले को मुजफ्फरनगर स्थानांतरित किए जाने के आदेश पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मामले के ट्रांसफर से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और पीड़ित पक्ष को निष्पक्ष सुनवाई को लेकर चिंता बनी हुई है।
उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि इस मामले में पहले सीबीआई ने गैर इरादतन हत्या की धारा के तहत आरोप पत्र दाखिल किया था, लेकिन अदालत ने घटनाक्रम की गंभीरता को देखते हुए हत्या की धारा में संज्ञान लिया था। इसी आधार पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ी।
लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा
रामपुर तिराहा कांड उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे संवेदनशील घटनाक्रमों में गिना जाता है। आंदोलनकारियों का आरोप रहा है कि उस दौरान प्रशासनिक स्तर पर गंभीर लापरवाही और अत्यधिक बल प्रयोग हुआ था। इस मामले में वर्षों से कानूनी लड़ाई जारी है और कई पक्ष लगातार निष्पक्ष जांच की मांग करते रहे हैं।
याचिकाकर्ता पहले इस प्रकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी गए थे। वहां से उन्हें हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने की अनुमति मिली थी। फिलहाल मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट में विचाराधीन है और अदालत ने जांच एजेंसी से जवाब मांगकर मामले को फिर चर्चा में ला दिया है।