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Judiciary – UAPA मामलों में जमानत नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में छिड़ी गहरी बहस

Judiciary – सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों आतंकवाद निरोधी कानून UAPA के तहत जमानत को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बहस चल रही है। केंद्र सरकार ने अदालत के सामने यह सवाल उठाया है कि क्या केवल मुकदमे में देरी होने के आधार पर गंभीर आतंकवाद मामलों के आरोपियों को भी राहत दी जा सकती है। इस बहस ने राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

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केंद्र सरकार ने कोर्ट में रखी सख्त दलील

सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि सभी मामलों को एक समान नजरिए से नहीं देखा जा सकता। उन्होंने अदालत के सामने उदाहरण देते हुए कहा कि बड़े आतंकी मामलों में गवाहों की संख्या और सबूत जुटाने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। ऐसे में केवल ट्रायल में देरी को जमानत का आधार बनाना उचित नहीं होगा।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि अदालत को आरोपी की भूमिका, अपराध की गंभीरता और समाज पर उसके प्रभाव को ध्यान में रखकर फैसला करना चाहिए। सुनवाई के दौरान अजमल कसाब और हाफिज सईद जैसे नामों का उल्लेख इसी संदर्भ में किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों में मतभेद

UAPA मामलों में जमानत को लेकर सुप्रीम Court की दो अलग-अलग पीठों की राय अलग दिखाई दी है। एक पीठ ने हाल में कहा था कि यदि किसी आरोपी का मुकदमा लंबे समय तक लंबित है और वह वर्षों से जेल में है, तो उसे जमानत पर विचार मिलना चाहिए। वहीं दूसरी पीठ ने यह स्पष्ट किया कि लंबी हिरासत को स्वतः जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

जनवरी 2026 में दिल्ली दंगा मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए अदालत ने अपराध की प्रकृति को अहम माना था। दूसरी ओर मई 2026 में एक अन्य मामले में अदालत ने लंबे समय से जेल में बंद आरोपी को राहत देने की बात कही थी।

अब बड़ी पीठ करेगी अंतिम फैसला

इन विरोधाभासी टिप्पणियों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। अब मुख्य न्यायाधीश इस संवैधानिक और कानूनी सवाल पर विस्तृत सुनवाई के लिए नई पीठ का गठन करेंगे। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर आने वाले समय में UAPA के तहत दर्ज कई मामलों पर पड़ सकता है।

हालांकि, इस बीच अदालत ने 2020 दिल्ली दंगा मामले के दो आरोपियों को सीमित अवधि की अंतरिम जमानत दी है। इससे यह संकेत मिला है कि अदालत हर मामले की परिस्थितियों को अलग-अलग आधार पर देख रही है।

पुराने फैसलों से जुड़ा है पूरा विवाद

इस कानूनी बहस की पृष्ठभूमि 2021 के उस फैसले से जुड़ी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि मुकदमे में अत्यधिक देरी हो रही है तो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी को राहत दी जा सकती है। अदालत ने तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण अधिकार माना था।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिद्धांत हर मामले में समान रूप से लागू किया जा सकता है, खासकर तब जब मामला आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो। केंद्र सरकार का तर्क है कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता और सुरक्षा पहलुओं को भी महत्व देना जरूरी है।

कानून और अधिकारों के बीच संतुलन की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए बेहद अहम है। एक तरफ लंबे समय तक बिना सजा जेल में रहना मौलिक अधिकारों से जुड़ा विषय है, वहीं दूसरी तरफ आतंकवाद से जुड़े मामलों में सुरक्षा एजेंसियों की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच पर है, जो यह तय करेगी कि UAPA जैसे सख्त कानूनों में जमानत का दायरा कितना व्यापक होना चाहिए और किन परिस्थितियों में अदालत राहत दे सकती है।

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