Prithviraj Chavan: सेना की शक्ति और युद्ध कौशल पर पृथ्वीराज चव्हाण के बयान ने छेड़ी नई बहस, क्या माफी न मांगने की जिद बढ़ाएगी कांग्रेस की मुश्किलें…
Prithviraj Chavan: महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण अपने हालिया विवादित बयान पर अडिग नजर आ रहे हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर दिए गए उनके बयान पर जब चौतरफा दबाव बढ़ा, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में माफी मांगने से इनकार कर दिया। चव्हाण का तर्क है कि भारत का संविधान (Freedom of Speech) के तहत उन्हें सवाल पूछने का अधिकार देता है। सोमवार को पत्रकारों से मुखातिब होते हुए उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा है और वे जल्द ही इस पूरे मसले पर मीडिया के सामने विस्तार से अपनी बात रखेंगे।

ऑपरेशन सिंदूर में भारत की हार का सनसनीखेज दावा
पुणे में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चव्हाण ने एक ऐसा दावा किया जिसने रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। उन्होंने कहा कि भारत ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के पहले ही दिन हार गया था। उनके मुताबिक, 7 मई को हुए महज आधे घंटे के (Aerial Combat) में भारतीय वायुसेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। चव्हाण ने यहां तक कह दिया कि उस दौरान भारतीय विमान गिरा दिए गए थे और वायुसेना पूरी तरह जमीन पर रहने को मजबूर थी, क्योंकि ग्वालियर या बठिंडा से उड़ान भरने पर उनके पाकिस्तान द्वारा गिराए जाने का खतरा था।
भारतीय सेना की संख्या बल पर उठाए गंभीर सवाल
युद्ध के कौशल के साथ-साथ पूर्व मुख्यमंत्री ने भारतीय सेना में सैनिकों की विशाल संख्या पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने तुलनात्मक आंकड़े पेश करते हुए कहा कि भारत के पास 12 से 15 लाख सैनिक हैं, जबकि पाकिस्तान के पास केवल 5 से 6 लाख सैनिक हैं। चव्हाण के अनुसार, आधुनिक युग में (Military Strength) का पैमाना केवल सैनिकों की संख्या नहीं रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि भविष्य में जमीनी स्तर के युद्ध की संभावनाएं बेहद कम हैं, इसलिए इतनी बड़ी फौज रखने का अब कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है।
पैदल सेना की उपयोगिता पर नई बहस
पृथ्वीराज चव्हाण ने अपनी दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अब वह दौर बीत चुका है जब युद्ध केवल पैदल सेना के दम पर जीते जाते थे। उन्होंने कहा कि कोई भी देश अब उस तरह का पारंपरिक युद्ध (Infantry Warfare) नहीं करने देगा। उनके अनुसार, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय सेना एक किलोमीटर भी आगे नहीं बढ़ सकी थी। लड़ाई केवल हवाई हमलों और मिसाइल दागने तक ही सीमित रही थी। चव्हाण का मानना है कि आने वाले समय में भी युद्ध का स्वरूप तकनीकी और हवाई हमलों पर आधारित ही रहने वाला है।
सैनिकों को दूसरे कामों में लगाने की दी सलाह
सैनिकों की संख्या पर सवाल उठाने के बाद कांग्रेस नेता ने सरकार को एक विवादास्पद सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि जब युद्ध का स्वरूप बदल चुका है, तो (Army Human Resources) को केवल सरहदों पर तैनात रखना समझदारी नहीं है। चव्हाण ने सुझाव दिया कि 12 लाख सैनिकों की फौज रखने के बजाय उन्हें किसी और उत्पादक कार्य में लगाया जाना चाहिए। उनके इस बयान को सेना के मनोबल और सुरक्षा ढांचे पर हमले के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भाजपा को कांग्रेस को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।
वायुसेना की क्षमता पर सवालिया निशान
चव्हाण ने विशेष रूप से वायुसेना की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऑपरेशन के दौरान भारतीय वायुसेना पूरी तरह से ‘ग्राउंडेड’ थी। उनके अनुसार, (Indian Air Force Capabilities) उस समय पाकिस्तान के सामने रक्षात्मक मुद्रा में थी। उन्होंने दावा किया कि सिरसा और बठिंडा जैसे रणनीतिक एयरबेस से विमान न उड़ने के पीछे पाकिस्तान का डर था। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों ने उनके इन दावों को ऐतिहासिक तथ्यों से परे बताते हुए कड़ी आलोचना की है और इसे सेना के शौर्य का अपमान करार दिया है।
संविधान और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला
अपनी सफाई में पृथ्वीराज चव्हाण ने बार-बार लोकतांत्रिक अधिकारों की बात की। उन्होंने कहा कि एक जनप्रतिनिधि और नागरिक होने के नाते उन्हें सरकार की (Defense Strategic Planning) पर सवाल उठाने का पूरा हक है। उन्होंने पत्रकारों से सवाल किया कि क्या सवाल पूछना अब अपराध बन गया है? चव्हाण ने स्पष्ट किया कि वे अपने बयान पर कायम हैं और वे इसे गलत नहीं मानते। उनके इस रुख ने कांग्रेस पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि सेना से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर ऐसी बयानबाजी राजनीतिक रूप से महंगी पड़ सकती है।
आधुनिक युद्ध और भविष्य की चुनौतियां
चव्हाण के बयानों ने इस बात पर एक नई बहस शुरू कर दी है कि क्या भारत को अपनी ‘टू-फ्रंट वार’ की रणनीति को बदलने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि (Modern Warfare Technology) के दौर में भी पैदल सेना का अपना महत्व है, जिसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। हालांकि, चव्हाण के बयानों को केवल सैन्य सुधार के सुझाव के तौर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखा जा रहा है। अब देखना यह है कि कांग्रेस आलाकमान इस विवाद पर क्या रुख अपनाता है और क्या चव्हाण अपने दावों के समर्थन में कोई पुख्ता सबूत पेश कर पाएंगे।



