Jharkhand Liquor Scam Investigation: जानें, घटिया ब्रांड और अफसरों की सांठगांठ ने कैसे निगले सरकारी तिजोरी के 136 करोड़…
Jharkhand Liquor Scam Investigation: झारखंड में सामने आया शराब घोटाला केवल प्लेसमेंट एजेंसियों की हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार थोक कारोबार के ऊंचे गलियारों से जुड़े हुए हैं। जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि मेसर्स ओम साईं बिवरेजेज जैसी कंपनियों ने सरकारी तंत्र के साथ मिलकर एक ऐसा मायाजाल बुना, जिसने राज्य के राजस्व को भारी चोट पहुंचाई है। अधिकारियों को प्रभाव में लेकर जिस तरह से (Illegal Wholesale Trading) को अंजाम दिया गया, उसने पूरे प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यह भ्रष्टाचार का वह चेहरा है जहां नियमों को ताक पर रखकर निजी स्वार्थ को सर्वोपरि रखा गया।

बिना टेंडर के चहेती कंपनियों को रेवड़ी की तरह बांटे ठेके
शराब घोटाले की जांच की परतों में यह बात साफ तौर पर उभरी है कि मेसर्स भाटिया वाइंस और छत्तीसगढ़ डिस्टिलरी लिमिटेड जैसी कंपनियों को नियम विरुद्ध लाभ पहुंचाया गया। आमतौर पर शराब की आपूर्ति के लिए झारखंड सरकार और जेएसीबीसीएल को पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी, लेकिन (Public Procurement Fraud) के जरिए इसे दरकिनार कर दिया गया। महज एक लिखित आवेदन के आधार पर बड़े ठेके उन कंपनियों को सौंप दिए गए, जिनका रसूख तत्कालीन अधिकारियों तक था। यह लोकतंत्र में पारदर्शिता की हत्या और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है।
घटिया क्वालिटी की शराब और जनता की सेहत से खिलवाड़
मुनाफे की इस अंधी दौड़ में भ्रष्टाचारियों ने जनता की सेहत की भी परवाह नहीं की। जांच के दौरान यह पाया गया कि बाजार में रोमियो और महुआ जैसे घटिया क्वालिटी के ब्रांड्स को जबरन उतारा गया। (Substandard Product Quality) वाली इन शराबों की बिक्री कर न केवल राज्य को 136 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान पहुंचाया गया, बल्कि उपभोक्ताओं के साथ भी धोखाधड़ी की गई। सरकार की 2022 की शराब नीति का उल्लंघन कर जिस तरह से इन ब्रांड्स को बढ़ावा दिया गया, वह एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।
रसूखदार अफसरों का संरक्षण और कमीशन का खेल
इस पूरे घोटाले के पीछे तत्कालीन उत्पाद सचिव विनय कुमार चौबे जैसे बड़े नामों का प्रभाव सामने आ रहा है। भ्रष्टाचार के इस खेल में अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए (Government Official Misconduct) के जरिए चहेते शराब निर्माताओं को लाभ पहुंचाया। जांच में पता चला है कि होलसेल का टेंडर लेने वाली कंपनियों ने केवल उन्हीं निर्माताओं की शराब दुकानों तक पहुंचाई, जिनसे उन्हें मोटा कमीशन मिलता था। यही कारण था कि उस दौरान लोकप्रिय ब्रांड्स बाजार से पूरी तरह गायब हो गए थे और लोगों को मजबूरन घटिया ब्रांड खरीदने पड़ रहे थे।
सिद्धार्थ सिंघानिया के कबूलनामे ने खोली पोल
भ्रष्टाचार की इस कड़वी कहानी में सिद्धार्थ सिंघानिया की गवाही एक अहम मोड़ बनकर सामने आई है। सिंघानिया, जो विनय कुमार चौबे के करीबी माने जाते हैं, उन्होंने पूछताछ में स्वीकार किया है कि शराब की आपूर्ति करने वाली कंपनियों से अवैध उगाही की जाती थी। (Confessional Statement Analysis) के दौरान यह तथ्य सामने आया कि देशी और विदेशी शराब के प्रति कार्टन पर 300 से 600 रुपये तक की अवैध वसूली की जाती थी। यह पैसा किसी एक व्यक्ति की जेब में नहीं, बल्कि पूरे सिंडिकेट में बंटता था।
प्रति कार्टन अवैध उगाही और सिंडिकेट का ढांचा
अतुल सिंह और मुकेश मनचंदा जैसे बिचौलियों के माध्यम से कंपनियों से करोड़ों रुपये वसूले गए। मेसर्स ओम साईं बिवरेजेज और दिशिता वेंचर्स ने इस उगाही को अंजाम देने के लिए एक सुव्यवस्थित ढांचा तैयार किया था। (Criminal Syndicate Operation) के जरिए वसूल की गई यह अवैध राशि सीधे तौर पर ऊंचे पदों पर बैठे अरुणपति त्रिपाठी और विनय कुमार चौबे जैसे लोगों तक पहुंचाई जाती थी। यह केवल पैसों की हेराफेरी नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध था जिसने राज्य की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया।
पॉपुलर ब्रांड्स की कमी और कृत्रिम किल्लत का सच
जब भ्रष्टाचार चरम पर होता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी और सरकारी राजस्व का होता है। शराब निर्माताओं से कमीशन सेट करने के चक्कर में सिंडिकेट ने जानबूझकर पॉपुलर ब्रांड्स की सप्लाई रोक दी थी। (Market Supply Manipulation) की इस रणनीति के कारण दुकानों में केवल वही शराब उपलब्ध थी, जिसमें अफसरों और बिचौलियों का हिस्सा तय था। इस साजिशन किल्लत ने राज्य सरकार को मिलने वाले राजस्व में भारी गिरावट दर्ज की, जिसका कुल आंकड़ा अब 136 करोड़ के पार पहुंच चुका है।
एसीबी की जांच में कानून का बढ़ता शिकंजा
एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) इस मामले की तह तक जाने के लिए कड़ाई से पूछताछ और दस्तावेजों की पड़ताल कर रही है। भूपेंद्र पाल सिंह भाटिया और नवीन केडिया जैसे व्यापारिक दिग्गजों की भूमिका की जांच की जा रही है कि कैसे उन्होंने बिना किसी प्रतिस्पर्धा के (Unlawful Business Practices) को बढ़ावा दिया। पुलिस और जांच एजेंसियां अब उन सभी संपत्तियों का ब्यौरा जुटा रही हैं, जो इस घोटाले की काली कमाई से बनाई गई हैं। आने वाले समय में कई और बड़े चेहरों की गिरफ्तारी की संभावना जताई जा रही है।
भ्रष्टाचार मुक्त शासन की बढ़ती मांग
झारखंड के इस शराब घोटाले ने राजनीतिक गलियारों में भी भूचाल ला दिया है। आम जनता अब उन दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रही है जिन्होंने जनता के पैसे को अपनी विलासिता का साधन बनाया। (Judicial Inquiry Expectations) के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में ऐसी नीतियों पर अंकुश लगाया जा सकेगा जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं। 136 करोड़ का यह घाटा केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का कत्ल है जो जनता अपनी सरकार पर करती है। अब सबकी निगाहें कोर्ट और जांच एजेंसियों के अगले कदम पर टिकी हैं।



