उत्तराखण्ड

Uttarakhand Forest Fire Crisis: उत्तराखंड में एक तरफ कड़कड़ाती ठंड, दूसरी तरफ धधकते पहाड़, आखिर क्यों जल रहे हैं देवभूमि के जंगल…

Uttarakhand Forest Fire Crisis: देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों एक अजीबोगरीब और डरावने विरोधाभास से गुज़र रहा है। जहां मैदानी इलाकों में लोग कोहरे और शीतलहर से ठिठुर रहे हैं, वहीं राज्य के ऊंचे पहाड़ों पर भीषण आग (Forest Fire Incidents) ने कोहराम मचा रखा है। गुरुवार को उत्तरकाशी और बागेश्वर के जंगलों से उठी आग की लपटों ने वन्य संपदा को भारी नुकसान पहुंचाया है। यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए चिंताजनक है, बल्कि स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाल रही है, क्योंकि धुएं के गुबार ने पहाड़ों की ताजी हवा को ज़हरीला बना दिया है।

Uttarakhand Forest Fire Crisis
Uttarakhand Forest Fire Crisis

उत्तरकाशी के बड़कोट में बेकाबू हुई लपटें

उत्तरकाशी जिले के बड़कोट स्थित अपर यमुना वन प्रभाग में गुरुवार शाम को आग लगने की घटना ने विकराल रूप ले लिया। देखते ही देखते आग ने जंगल के एक बहुत बड़े हिस्से को अपनी आगोश में ले लिया, जिससे (Environmental Degradation Impact) का खतरा बढ़ गया है। वन विभाग की टीमें देर रात तक आग पर काबू पाने की जद्दोजहद में जुटी रहीं, लेकिन शुष्क मौसम के कारण लपटें शांत होने का नाम नहीं ले रही थीं। गौरतलब है कि इसी क्षेत्र के कंसेरु गांव में मंगलवार को भी जंगल जलकर खाक हो गया था, जो सुरक्षा इंतजामों पर सवाल खड़े करता है।

बागेश्वर में एक सप्ताह के भीतर चौथी बड़ी घटना

बागेश्वर जिले में भी वनाग्नि का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। गुरुवार को यहां दो अलग-अलग स्थानों पर आग भड़क उठी, जिसे कड़ी मशक्कत के बाद वन विभाग ने नियंत्रित किया। (Wildfire Control Measures) के बावजूद बागेश्वर में एक हफ्ते के भीतर यह चौथी घटना है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक यहां पांच हेक्टेयर से अधिक जंगल जल चुका है। वन विभाग की वेबसाइट पर दर्ज आंकड़े भले ही कम हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार नुकसान का दायरा कहीं अधिक बड़ा और डरावना है।

सूखे की मार और बारिश न होना बना मुख्य कारण

विशेषज्ञों और वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस बेमौसम आग के पीछे का सबसे बड़ा कारण लंबे समय से बारिश न होना है। पहाड़ों पर (Climate Change Effects) के चलते सर्दियों में होने वाली बारिश और बर्फबारी गायब है। दिन के समय तेज़ धूप और शुष्क हवाओं ने जंगलों में मौजूद सूखी पत्तियों को बारूद बना दिया है। जब तक देवभूमि में अच्छी बारिश नहीं होती, तब तक इन धधकते जंगलों को शांत करना वन विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।

पूरे प्रदेश में आग का तांडव और आंकड़ों का खेल

वन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक एक नवंबर के बाद से अब तक करीब आठ हेक्टेयर जंगल जल चुका है, लेकिन जिलों से मिल रही रिपोर्ट इस आंकड़े को झुठलाती हैं। पौड़ी के कोट ब्लॉक में ही (Deforestation and Loss of Biodiversity) का मंज़र ऐसा था कि वहां अकेले 5 हेक्टेयर जंगल स्वाहा हो गया। रुद्रप्रयाग, चमोली और मुनस्यारी जैसे ठंडे इलाकों में भी आग की खबरें चौंकाने वाली हैं। मुनस्यारी, जो अपनी बर्फबारी के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वहां भी कालामुनी के जंगल आग की चपेट में आ गए, जो पारिस्थितिक तंत्र के बिगड़ने का स्पष्ट संकेत है।

फायर अलर्ट में उत्तराखंड ने देश को पीछे छोड़ा

एक बेहद चिंताजनक आंकड़े के अनुसार, पिछले डेढ़ महीने में उत्तराखंड में 1919 से ज़्यादा फायर अलर्ट आए हैं, जिससे यह राज्य देश में पहले नंबर पर पहुंच गया है। (Forest Fire Monitoring System) के जरिए फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अकेले गुरुवार को ही 53 अलर्ट जारी किए। हालांकि, विभाग का कहना है कि इनमें से कई अलर्ट कूड़ा जलाने या अन्य छोटी घटनाओं के हो सकते हैं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में अलर्ट आना यह दर्शाता है कि उत्तराखंड के जंगलों की सुरक्षा इस वक्त सबसे नाजुक दौर में है।

प्रदूषण का बढ़ता स्तर और धुंध की चादर

जंगलों के जलने से निकलने वाला धुआं अब केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है। भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन और धुएं के कारण वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) लगातार गिर रहा है। (Atmospheric Pollution Levels) में हुई इस वृद्धि ने सांस के मरीजों और बुजुर्गों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कोहरे और धुएं के मिलने से ‘स्मॉग’ जैसी स्थिति पैदा हो रही है, जिससे पहाड़ों की दृश्यता कम हो गई है और पर्यावरण प्रेमी इसे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं।

वन विभाग की तैयारी और सीसीएफ का बयान

वनाग्नि प्रबंधन के मुख्य वन संरक्षक (CCF) सुशांत पटनायक ने बताया कि संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी गई है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि (Resource Management Efficiency) को देखते हुए हर अलर्ट की जांच की जाती है, भले ही उनमें से 70 प्रतिशत अलर्ट सटीक न हों। विभाग का दावा है कि वे हर छोटी आग को रोकने के लिए तैयार हैं, लेकिन भौगोलिक विषमताएं और पानी की कमी उनकी राह में रोड़ा बन रही हैं।

देवभूमि के भविष्य पर मंडराता संकट

यदि वनाग्नि की इन घटनाओं पर समय रहते लगाम नहीं लगाई गई, तो उत्तराखंड के ग्लेशियरों और जल स्रोतों पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। (Ecological Balance Restoration) के लिए ज़रूरी है कि स्थानीय समुदाय और प्रशासन मिलकर काम करें। जंगलों के किनारे कूड़ा जलाने की आदतों पर सख्ती से रोक लगानी होगी और वनीकरण के साथ-साथ ‘फायर लाइन’ के रखरखाव पर विशेष ध्यान देना होगा। अगामी समय में अगर बारिश नहीं होती है, तो यह आग देवभूमि की हरियाली को राख में बदलने की ताकत रखती है।

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