उत्तर प्रदेश

Lucknow Monument Scam Investigation: कमिश्नर की जांच ने बढ़ाई अधिकारियों की धड़कन, जानें क्या होगा अंजाम…

Lucknow Monument Scam Investigation: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बसपा शासनकाल के दौरान पत्थरों के नाम पर जो खेल खेला गया था, उसकी आंच अब जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचने लगी है। लगभग 1400 करोड़ रुपये का (Financial Misappropriation) यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। कमिश्नर विजय विश्वास पंत ने जांच की कमान संभालते ही एलडीए के गलियारों में खलबली मचा दी है। वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी फाइलों को अब बाहर निकाला जा रहा है ताकि दोषियों को उनके किए की सजा दिलाई जा सके।

Lucknow Monument Scam Investigation
Lucknow Monument Scam Investigation

2007 से 2011 के बीच बुना गया लूट का जाल

यह महाघोटाला उस समय का है जब लखनऊ और नोएडा को भव्य स्मारकों और उद्यानों से सजाया जा रहा था। अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल से लेकर नोएडा के अंबेडकर पार्क तक, हर जगह (Public Fund Misuse) की खबरें सामने आईं। इन परियोजनाओं के लिए 42 अरब 76 करोड़ रुपये का विशाल बजट स्वीकृत किया गया था, जिसमें से अधिकांश हिस्सा पत्थरों की खरीद और निर्माण के नाम पर ठिकाने लगा दिया गया। विजिलेंस की 2014 की एफआईआर इस जांच का मुख्य आधार बनी हुई है।

सेवानिवृत्त अभियंताओं पर गिरेगी कार्रवाई की गाज

जांच की सुई अब सीधे उन अधिकारियों पर टिक गई है जो उस समय महत्वपूर्ण पदों पर आसीन थे। तत्कालीन अधीक्षण अभियंता विमल कुमार सोनकर और मुख्य अभियंता त्रिलोकी नाथ, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, के खिलाफ (Administrative Disciplinary Action) की तैयारी तेज हो गई है। शासन के स्पष्ट आदेश हैं कि रिटायरमेंट के बाद भी यदि भ्रष्टाचार के सबूत मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों को कानून के दायरे में लाया जाए।

57 अधिकारियों की गर्दन पर लटकी तलवार

इस घोटाले में केवल लखनऊ विकास प्राधिकरण ही नहीं, बल्कि राजकीय निर्माण निगम के अधिकारी भी समान रूप से भागीदार पाए गए हैं। जांच रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 57 अधिकारी और कर्मचारी इस (Organized Corruption Scheme) का हिस्सा थे। कमिश्नर ने एलडीए सचिव विवेक श्रीवास्तव को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है ताकि सभी जरूरी दस्तावेज और सबूत समय पर उपलब्ध कराए जा सकें और जांच में कोई तकनीकी बाधा न आए।

शासन का सख्त आदेश: तत्काल कार्रवाई की रिपोर्ट

22 दिसंबर 2025 को जारी शासन के आदेश ने इस मामले में नई जान फूंक दी है। कमिश्नर को निर्देश दिए गए हैं कि वह बिना किसी देरी के जांच पूरी करें और (Accountability Enforcement) की रिपोर्ट प्रस्तुत करें। मुख्यमंत्री कार्यालय इस पूरे मामले की सीधी निगरानी कर रहा है, जिससे यह साफ है कि इस बार लीपापोती की गुंजाइश बहुत कम है। दोषियों की संपत्ति की जांच और रिकवरी की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है।

भव्य स्मारकों के पीछे छिपा काला सच

अंबेडकर पार्क और ईको ग्रीन गार्डन जैसे स्थल आज पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं, लेकिन इनके निर्माण में इस्तेमाल हुए पत्थरों की कीमत बाजार भाव से कहीं अधिक दिखाई गई थी। यह (Construction Materials Overpricing) इस घोटाले का मुख्य केंद्र बिंदु रहा है। एलडीए और राजकीय निर्माण निगम के बीच हुए पत्राचार और टेंडर प्रक्रिया की बारीकियों को अब खंगाला जा रहा है ताकि यह साबित हो सके कि नियमों को ताक पर रखकर चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया गया था।

न्याय की उम्मीद और भ्रष्टाचार पर प्रहार

लखनऊ के इस महाघोटाले की जांच का फिर से सक्रिय होना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में समय बीत जाने के बाद भी राहत नहीं मिलती। कमिश्नर द्वारा (Swift Investigation Process) अपनाना उन अधिकारियों के लिए चेतावनी है जो पद पर रहते हुए जनता के पैसे का दुरुपयोग करते हैं। जनता अब उम्मीद कर रही है कि इस बार यह जांच किसी ठोस नतीजे तक पहुंचेगी और 1400 करोड़ रुपये की लूट के असली मास्टरमाइंड जेल की सलाखों के पीछे होंगे।

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